उपनाम: ऐतिहासिक धरोहर
सुल्तानपुर का अनमोल धरोहर: हरीपुर बनवा गांव में 11वीं शताब्दी की प्राचीन शिव मूर्ति और श्रद्धालुओं की गहरी आस्था
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में स्थित हरीपुर बनवा गांव एक प्राचीन शिव मंदिर का केंद्र है, जहाँ 11वीं शताब्दी की नक्काशी वाली मूर्ति की लोग श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं।
नागौर की ऐतिहासिक जल धरोहरों का होगा कायाकल्प, 10.23 करोड़ की लागत से संवरेंगे तालाब
नागौर के तीन प्रमुख ऐतिहासिक तालाबों के संरक्षण और सौंदर्यीकरण के लिए सरकार ने 10.23 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी है। इस परियोजना से शहर की जल धरोहरों को नई पहचान मिलेगी और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
गोलकोंडा किले की 400 साल पुरानी शाही बावड़ी, जिसकी इंजीनियरिंग देख रह जाएंगे हैरान
हैदराबाद के गोलकोंडा किले में मौजूद शाही बावड़ी कुतुबशाही दौर की उन्नत जल प्रबंधन व्यवस्था की मिसाल है, जो आज भी अपनी बनावट और इतिहास से पर्यटकों को लुभाती है।
हाजीपुर का 12वीं सदी का नेपाली मंदिर: 'बिहार का खजुराहो' अब उपेक्षा और बदहाली की चपेट में
हाजीपुर के कोनहारा घाट पर स्थित नेपाली छावनी मंदिर अपनी लकड़ी की बारीक नक्काशी और अनूठी वास्तुकला के लिए 'बिहार का खजुराहो' कहलाता है, लेकिन देखरेख के अभाव में यह ऐतिहासिक धरोहर लगातार जर्जर होती जा रही है।
सुल्तानपुर का 160 साल पुराना नीम का पेड़, छाल पर उभरी अनोखी आकृति बनी आस्था का केंद्र
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के लोहरा मऊ गांव में करीब 160 साल पुराना एक नीम का पेड़ श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है, जिसकी छाल पर बनी अद्भुत आकृति और गर्मियों में दोपहर के समय दिखने वाली चींटियों की कतारें लोगों के आकर्षण का कारण हैं।
झांसी के 10 ऐतिहासिक दरवाजे: सदियों तक दुश्मनों को रोकने वाली मजबूत ढाल, जानिए इनकी खासियत
झांसी की प्राचीन सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा रहे ये दस ऐतिहासिक दरवाजे बुंदेलखंड की विरासत और रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य के मूक गवाह हैं, जो आज भी शहर की पहचान बने हुए हैं।
मुजफ्फरपुर का 150 साल पुराना वटवृक्ष: भीषण गर्मी में लोगों के लिए बना राहत का सहारा
मुजफ्फरपुर के कंबाइंड बिल्डिंग परिसर में मौजूद करीब 150 साल पुराना विशाल वटवृक्ष इन दिनों भीषण गर्मी और उमस से जूझ रहे लोगों के लिए प्राकृतिक राहत का बड़ा केंद्र बन गया है। यह पेड़ शहर की ऐतिहासिक धरोहर के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का जीवंत संदेश भी है।
तालाब की खुदाई में मिला 250 साल पुराना अतीत, कीर्ति स्तंभ और शिलालेख ने उजागर किए इतिहास के पन्ने
बीकानेर के सिंसा भैरव तालाब की खुदाई में प्राचीन प्रतिमा, शिलालेख और कीर्ति स्तंभ मिले हैं। शिलालेख के अनुसार तालाब का निर्माण विक्रम संवत 1837 में हुआ था।
गोलकोंडा का नगीना बाग: जहां तपती गर्मी भी बेअसर हो जाती थी, रानियों की कहानी का असली सच क्या है?
हैदराबाद के गोलकोंडा किले का नगीना बाग कुतुबशाही दौर में रत्न और हीरों का व्यापार केंद्र था। यहां की ठंडक उन्नत वास्तुकला की देन थी, जबकि रानियों के झूले और गुलाब जल के फव्वारों की कहानियों को इतिहासकार दंतकथा मानते हैं।
चांदो सौदागर का राजवाड़ा कभी था, अब जर्जर हालत में खड़ी है भागलपुर की महाशय ड्योढ़ी, 18 दिन चलती है दुर्गा पूजा
भागलपुर की महाशय ड्योढ़ी कभी चांदो सौदागर का राजवाड़ा कही जाती थी, पर आज यह ऐतिहासिक इमारत जर्जर हालत में अपने संरक्षण की राह देख रही है। यहां 18 दिनों तक चलने वाली दुर्गा पूजा और कौड़ी लुटाने की परंपरा भी खासी मशहूर है।
दिल्ली विजय की निशानी: भरतपुर किले का अष्टधातु द्वार आज भी बयां करता है जाट शौर्य की गाथा
भरतपुर किले के पूर्वी द्वार पर स्थापित अष्टधातु का यह ऐतिहासिक द्वार जाट वीरता और स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि महाराजा जवाहर सिंह इसे 1765 में दिल्ली विजय के दौरान भरतपुर लाए थे।
हैदराबाद की गगनचुंबी इमारतों के बीच खड़ा सदियों पुराना पत्थर मंडप, देखकर रह जाएंगे हैरान
हैदराबाद के पाटनचेरु इलाके में आधुनिक इमारतों के बीच काकतीय दौर का माना जाने वाला एक प्राचीन पत्थर मंडप आज भी खड़ा है। इतिहास प्रेमी इसकी पुरातात्विक जांच और संरक्षण की मांग कर रहे हैं।
महराजगंज: निचलौल के बावन कुओं का अनसुलझा रहस्य, नेपाल के थारू समाज से जुड़ी सदियों पुरानी कहानी
महराजगंज के निचलौल क्षेत्र के इटहिआ में मौजूद बावन कुएं इलाके की ऐतिहासिक धरोहर हैं, जिनका नाता नेपाल के थारू समुदाय से सदियों पुराना माना जाता है। आज इनमें से अधिकांश कुएं मिट्टी से भरकर लुप्त होते जा रहे हैं।
1947 की आजादी का गवाह कुआं! सुल्तानपुर के लोहरामऊ गांव में आज भी सुरक्षित है यह ऐतिहासिक जलस्रोत
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के लोहरामऊ गांव में स्थित यह कुआं 1947 में देश के आजाद होने की खुशी में बनवाया गया था। अब इसका पानी इस्तेमाल नहीं होता, फिर भी ग्रामीण इसे एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संजोकर रखे हुए हैं।
हर दिशा से उतरती सीढ़ियां और जल बचाने की अनोखी तकनीक: यही है चोपड़ा बावड़ी का असली रहस्य
धौलपुर की ऐतिहासिक चोपड़ा बावड़ी अपनी चारों दिशाओं से उतरती सीढ़ियों और प्राचीन जल संरक्षण तकनीक के कारण आज भी सबको हैरान करती है। यह राजस्थान की समृद्ध स्थापत्य विरासत का अनूठा उदाहरण मानी जाती है।