गोलकोंडा का नगीना बाग: जहां तपती गर्मी भी बेअसर हो जाती थी, रानियों की कहानी का असली सच क्या है? राजस्थान एक घंटा पहले 2
हैदराबाद के गोलकोंडा किले का नगीना बाग कुतुबशाही दौर में रत्न और हीरों का व्यापार केंद्र था। यहां की ठंडक उन्नत वास्तुकला की देन थी, जबकि रानियों के झूले और गुलाब जल के फव्वारों की कहानियों को इतिहासकार दंतकथा मानते हैं।

ऐतिहासिक धरोहरों के साथ अक्सर ऐसे किस्से और दंतकथाएं जुड़ जाती हैं, जो समय बीतने के साथ ही इतिहास का हिस्सा मान ली जाती हैं। इसी तरह का एक दिलचस्प विवरण हैदराबाद के मशहूर गोलकोंडा किले में स्थित नगीना बाग से जुड़ा हुआ है। स्थानीय कहानियों और पर्यटकों के बीच लंबे समय से यह बात कही जाती रही है कि यह बाग खास तौर पर शाही महिलाओं के लिए तैयार किया गया एक सुंदर और आरामदायक विश्राम स्थल था।

गोलकोंडा किले से जुड़े कई स्थानीय गाइड बताते हैं कि नगीना बाग की बनावट कुछ ऐसी थी कि भीषण गर्मी में भी यहां का वातावरण ठंडा बना रहता था। बताया जाता है कि रानियों के मनोरंजन के लिए यहां एक विशाल झूला लगाया गया था, जिसकी कड़ियां छत की नक्काशीदार बीमों से जुड़ी हुई थीं। लोककथाओं के अनुसार जब रानियां झूला झूलती थीं, तो विशेष फव्वारों से गुलाब जल की फुहारें उठती थीं और पूरा परिसर खुशबू से भर जाता था। हालांकि इन कहानियों की सच्चाई को लेकर अलग-अलग राय सामने आती रही है।

इतिहास इस बारे में क्या कहता है

इतिहासकारों और पुरातात्विक दस्तावेजों के मुताबिक नगीना बाग का अस्तित्व पूरी तरह प्रमाणित है, मगर इसे सिर्फ शाही महिलाओं का निजी बगीचा मान लेना सही नहीं ठहराया जाता। उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी बताती है कि कुतुबशाही काल में यह स्थान कीमती रत्नों और हीरों के प्रदर्शन तथा व्यापार का प्रमुख केंद्र हुआ करता था।

अलग-अलग इलाकों से आने वाले व्यापारी यहां अपने बहुमूल्य नगीनों की नुमाइश किया करते थे। इसी वजह से इस जगह को नगीना बाग के नाम से पहचाना जाने लगा।

ठंडक का राज और दंतकथाओं की हकीकत

नगीना बाग के ठंडे वातावरण का जिक्र कई स्रोतों में मिलता है। गोलकोंडा किले की जल-प्रबंधन प्रणाली और वास्तुकला अपने समय की बेहद उन्नत तकनीकों में गिनी जाती थी। पत्थर और मिट्टी की मोटी दीवारों के बीच से होकर गुजरने वाली हवा जब पानी के संपर्क में आती थी, तो तापमान प्राकृतिक रूप से नीचे आ जाता था। यही कारण है कि किले के कई हिस्से गर्मी के मौसम में भी अपेक्षाकृत ठंडे बने रहते थे।

जहां तक गुलाब जल के फव्वारों और विशाल झूले की बात है, पुरातात्विक स्तर पर इसका कोई ठोस प्रमाण अब तक नहीं मिला है। शाही समारोहों और खास मौकों पर फव्वारों में गुलाब जल या केवड़े का इस्तेमाल जरूर होता था, लेकिन झूले और फव्वारों को आपस में जोड़ने वाली कहानी को ज्यादातर स्थानीय दंतकथा ही माना जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवरण उस दौर के शाही वैभव और लोककल्पनाओं से प्रेरित है, जिसका कोई सीधा ऐतिहासिक प्रमाण फिलहाल मौजूद नहीं है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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