चांदो सौदागर का राजवाड़ा कभी था, अब जर्जर हालत में खड़ी है भागलपुर की महाशय ड्योढ़ी, 18 दिन चलती है दुर्गा पूजा बिहार एक महीने पहले 21
भागलपुर की महाशय ड्योढ़ी कभी चांदो सौदागर का राजवाड़ा कही जाती थी, पर आज यह ऐतिहासिक इमारत जर्जर हालत में अपने संरक्षण की राह देख रही है। यहां 18 दिनों तक चलने वाली दुर्गा पूजा और कौड़ी लुटाने की परंपरा भी खासी मशहूर है।

भागलपुर का इतिहास बेहद पुराना है और यहां की कहानियां भी एकदम निराली हैं। शहर में कई ऐसी धरोहरें मौजूद हैं जो आज भी अपने संरक्षण और रखरखाव की बाट जोह रही हैं। ऐसी ही एक विरासत है महाशय ड्योढ़ी, जो साहेबगंज और चंपानगर के बीच स्थित है और देखभाल के अभाव में जर्जर अवस्था में पहुंच चुकी है।

18 दिन की दुर्गा पूजा और कौड़ी लुटाने की परंपरा

इस ड्योढ़ी की सबसे प्रसिद्ध दुर्गा पूजा पूरे 18 दिनों तक चलती है। यहां की एक खास परंपरा कौड़ी लुटाने की है, जिसे सुहागिन महिलाएं सौभाग्य का प्रतीक मानती हैं। यही वजह है कि यह स्थान आस्था और परंपरा के लिहाज से क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है।

क्या है इसकी कहानी

दरअसल महाशय ड्योढ़ी कभी एक भव्य हवेली हुआ करती थी, जो अब लगभग खंडहर में तब्दील हो चुकी है। इसका पूरा लेखा-जोखा रखने वाले चंपानगर के विनय लाल बताते हैं कि जिसे आज महाशय ड्योढ़ी कहा जाता है, वह असल में लखराज समाज की धरोहर है।

उनके मुताबिक पूर्वज बताया करते थे कि यह चंपानगर के सिल्क व्यापारी चंद्रधर सौदागर उर्फ चांदो सौदागर का रजवाड़ा था और वे यहीं से अपना कामकाज संभालते थे। उस दौर में सौदागर एक फाइनेंसर की भूमिका भी निभाते थे।

एशिया से यूरोप तक फैला था व्यापार

विनय लाल ने बताया कि चांदो सौदागर का कारोबार सिर्फ एशिया तक सीमित नहीं था, बल्कि यूरोपीय देशों तक फैला हुआ था। वे जलमार्ग के जरिए व्यापार किया करते थे। पूरे चंपानगर में लखराज समाज का दबदबा था, यानी यहां चांदो सौदागर के वंशज ही रहा करते थे। बाद में इसी समाज ने यह संपत्ति महाशय तारक नाथ घोष को सौंप दी।

आज भी दबी हैं अंग की कई कहानियां

उन्होंने बताया कि करीब 1908 के आसपास यह ड्योढ़ी महाशय तारक नाथ घोष को दे दी गई थी। इस पर विस्तार से बात करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय अंग्रेजी हुकूमत थी। जल टैक्स की वसूली के लिए बंगाल निवासी महाशय तारक नाथ घोष को यहां भेजा गया था।

रहने के लिए उन्हें परबत्ती में एक महल दिया गया था, लेकिन उन्हें गंगा का किनारा कहीं अधिक भाता था। यह ड्योढ़ी, जो कभी चंद्रधर सौदागर का घर हुआ करती थी, चंपा नदी के किनारे बसी हुई थी।

ऐसे हुई संपत्ति की अदला-बदली

जब तारक नाथ घोष ने इस जगह और यहां के मनोहारी नजारे को देखा, तो उन्होंने लखराज समाज के प्रमुख लोगों से इसे बेचने या किराए पर देने का प्रस्ताव रखा। समाज के लोगों ने इससे इनकार कर दिया। इस पर उन्होंने सुझाव दिया कि परबत्ती में उन्हें जो महल मिला है, उसे समाज ले ले और बदले में यह ड्योढ़ी उन्हें दे दी जाए। इसी तरह दोनों संपत्तियों की अदला-बदली हो गई।

हालांकि आज स्थिति यह है कि इस ऐतिहासिक धरोहर की देखभाल करने वाला कोई नहीं बचा है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप