हाजीपुर का 12वीं सदी का नेपाली मंदिर: 'बिहार का खजुराहो' अब उपेक्षा और बदहाली की चपेट में बिहार एक घंटा पहले 2
हाजीपुर के कोनहारा घाट पर स्थित नेपाली छावनी मंदिर अपनी लकड़ी की बारीक नक्काशी और अनूठी वास्तुकला के लिए 'बिहार का खजुराहो' कहलाता है, लेकिन देखरेख के अभाव में यह ऐतिहासिक धरोहर लगातार जर्जर होती जा रही है।

हाजीपुर के कोनहारा घाट पर स्थित नेपाली छावनी मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला, ऐतिहासिक महत्व और लकड़ी पर की गई अद्भुत नक्काशी के कारण देशभर में पहचाना जाता है। नेपाली पगोडा शैली में बना यह मंदिर सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि भारत और नेपाल की साझा सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक माना जाता है। दीवारों और खंभों पर उकेरी गई महीन कलाकृतियों के चलते इसे 'बिहार का खजुराहो' कहा जाता है। हालांकि वर्षों से समुचित देखरेख न मिलने के कारण यह ऐतिहासिक धरोहर अब बदहाली की ओर बढ़ रही है।

क्या है इसकी मान्यता

स्थानीय लोगों के अनुसार, नेपाली छावनी मंदिर का निर्माण नेपाल के तत्कालीन राजा ने करवाया था। बताया जाता है कि नेपाल के राजपरिवार के श्राद्ध कर्म और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराने वाले राज पुरोहितों को गंगा और गंडक (नारायणी) के संगम क्षेत्र में बसाया गया था। इन्हीं पुरोहितों के निवास और पूजा-अर्चना के उद्देश्य से इस मंदिर का निर्माण कराया गया।

स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, श्राद्ध कर्म पूरा होने के बाद इन राज पुरोहितों को मुजफ्फरपुर जिले के मीनापुर क्षेत्र में जमीन भी दी गई थी।

नक्काशी आज भी करती है आकर्षित

मंदिर की सबसे बड़ी खूबी इसकी लकड़ी पर उकेरी गई कलात्मक नक्काशी है। मंदिर के अलग-अलग हिस्सों में कामसूत्र और मानव जीवन से जुड़े कई दृश्य उकेरे गए हैं। यही वजह है कि इसकी तुलना मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध खजुराहो मंदिर समूह से की जाती है।

कला और स्थापत्य के जानकारों का मानना है कि यह मंदिर उस दौर की समृद्ध शिल्पकला और सांस्कृतिक सोच को दर्शाता है। इसकी नक्काशी आज भी देखने वालों को हैरान कर देती है। स्थानीय लोगों का दावा है कि यह मंदिर 12वीं शताब्दी का है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने भी इसके ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार किया है। इसके बावजूद मंदिर को वह संरक्षण नहीं मिल पाया, जिसकी इसे जरूरत है, और समय के साथ यह धरोहर लगातार जर्जर होती जा रही है।

संरक्षण जरूरी, वरना होगा गंभीर नुकसान

मंदिर की मौजूदा हालत चिंताजनक है। वर्षों से रखरखाव न होने के कारण इसकी संरचना कमजोर पड़ती जा रही है। मुख्य द्वार को छोड़कर बाकी तीनों द्वार दीमक की चपेट में आ चुके हैं और लकड़ी की नक्काशी वाले कई हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए हैं।

इसके साथ ही मंदिर की दीवारों और संरचना से जगह-जगह ईंटें झड़ रही हैं, जिससे इसकी मजबूती पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि समय रहते संरक्षण और मरम्मत का काम नहीं किया गया तो यह ऐतिहासिक धरोहर गंभीर नुकसान झेल सकती है।

बन सकता है पर्यटन का केंद्र

स्थानीय लोग और इतिहास प्रेमी लंबे समय से मंदिर के संरक्षण की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि बिहार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है। अगर इसका उचित संरक्षण हो तो यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सकता है।

कोनहारा का नेपाली छावनी मंदिर आज भी अपनी भव्यता और कलात्मक विरासत की कहानी कहता है। जरूरत बस इस बात की है कि संबंधित विभाग और प्रशासन इस पर गंभीरता से ध्यान दें, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी बिहार के इस अनमोल खजाने को देख और समझ सकें।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

आपकी प्रतिक्रिया?


आपको यह भी पसंद आ सकता हैं

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!