दिल्ली विजय की निशानी: भरतपुर किले का अष्टधातु द्वार आज भी बयां करता है जाट शौर्य की गाथा राजस्थान 2 घंटे पहले 3
भरतपुर किले के पूर्वी द्वार पर स्थापित अष्टधातु का यह ऐतिहासिक द्वार जाट वीरता और स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि महाराजा जवाहर सिंह इसे 1765 में दिल्ली विजय के दौरान भरतपुर लाए थे।

राजस्थान का भरतपुर किला अपने भीतर अनेक ऐतिहासिक धरोहरों को समेटे हुए है, और इन्हीं में से एक है अष्टधातु से बना प्रसिद्ध द्वार। यह द्वार न सिर्फ स्थापत्य कला का अनूठा नमूना है, बल्कि जाट वीरता, स्वाभिमान और गौरवशाली अतीत का प्रतीक भी माना जाता है। पूरे राजस्थान में इसकी अलग पहचान है।

इतिहास के पन्नों में दर्ज है यह कहानी

इतिहास के जानकार अरविंद पाल सिंह ने बातचीत में बताया कि भरतपुर के महाराजा जवाहर सिंह ने अपने पिता महाराजा सूरजमल की मृत्यु का बदला लेने के मकसद से वर्ष 1765 में दिल्ली पर चढ़ाई की थी। इसी दौरान उन्हें चित्तौड़ के एक प्रसिद्ध द्वार के बारे में जानकारी मिली, जो अत्यंत मजबूत अष्टधातु से बना था और अपनी विशेष पहचान रखता था।

साहस और रणनीति का परिचय

महाराजा जवाहर सिंह ने अपने पराक्रम और कुशल रणनीति का परिचय देते हुए इस विशाल द्वार को चित्तौड़ से उखड़वाकर भरतपुर पहुंचाया। उस दौर में इतनी भारी और मजबूत संरचना को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। यह घटना उनके अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प को दर्शाती है।

इतिहासकारों के अनुसार, द्वार को भरतपुर लाने के बाद महाराजा जवाहर सिंह ने चित्तौड़ के शासक के पास संदेश भिजवाया कि यदि वे चाहें तो इस द्वार को वापस ले जा सकते हैं। हालांकि उस समय न तो किसी ने इस ओर ध्यान दिया और न ही कोई इसे वापस लेने के लिए आगे आया। इसके बाद इस ऐतिहासिक द्वार को भरतपुर किले में स्थापित कर दिया गया।

पूर्वी द्वार पर अडिग खड़ा है यह द्वार

आज यह द्वार भरतपुर किले के पूर्वी द्वार पर मजबूती के साथ स्थापित है और इसे अष्टधातु द्वार के नाम से जाना जाता है। अरविंद पाल सिंह के अनुसार, अष्टधातु से बना यह द्वार इतने वर्षों बाद भी अपनी मजबूती और ऐतिहासिक पहचान को बरकरार रखे हुए है।

पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र

यह द्वार आज भी पर्यटकों और स्थानीय लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। दूर-दूर से आने वाले लोग इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने के लिए भरतपुर किले का रुख करते हैं और इससे जुड़ी वीरता की कहानी को जानने का प्रयास करते हैं।

शौर्यगाथा का जीवंत प्रमाण

अष्टधातु का यह द्वार महज एक ऐतिहासिक संरचना नहीं, बल्कि उस दौर की शौर्यगाथा का जीवंत प्रमाण है, जब सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा के लिए युद्ध लड़े जाते थे। यह द्वार आज भी जाट समाज के साहस, संघर्ष और गौरव की कहानी कहता है। सदियों पुरानी इस विरासत को संजोए यह द्वार आने वाली पीढ़ियों को अपने गौरवशाली इतिहास से जोड़ने का काम कर रहा है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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