महराजगंज: निचलौल के बावन कुओं का अनसुलझा रहस्य, नेपाल के थारू समाज से जुड़ी सदियों पुरानी कहानी उत्तर प्रदेश एक महीने पहले 21
महराजगंज के निचलौल क्षेत्र के इटहिआ में मौजूद बावन कुएं इलाके की ऐतिहासिक धरोहर हैं, जिनका नाता नेपाल के थारू समुदाय से सदियों पुराना माना जाता है। आज इनमें से अधिकांश कुएं मिट्टी से भरकर लुप्त होते जा रहे हैं।

महराजगंज जिले के निचलौल क्षेत्र के इटहिआ में स्थित बावन कुएं इस इलाके की गिनी-चुनी ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल हैं। यह स्थान केवल भारत-नेपाल सीमा के पास होने के कारण ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ी लोक कथाओं, ऐतिहासिक मान्यताओं और थारू समाज की पुरानी संस्कृति की झलक के लिए भी जाना जाता है। इतिहास में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए यह जगह बेहद रोचक है, क्योंकि यह थारू समाज की तत्कालीन व्यवस्था को सामने लाती है।

धीरे-धीरे लुप्त होती ऐतिहासिक धरोहर

बावन कुओं के पास ही स्थित एक मंदिर में पुजारी के रूप में कार्यरत बुद्धू महाराज बताते हैं कि यह मंदिर उस दौर से मौजूद है जब इस इलाके में थारू समाज के लोग बसे हुए थे, और समय बीतने के साथ जब वे यहां से जाने लगे, तब भी यह बना रहा। उनके अनुसार यहां बावन गढ़ी हुआ करती थी, इटौरा नाम का एक शहर था और रामपुरवा नाम का एक गांव भी था।

कुओं का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि बावन गढ़ी में बावन कुएं देखने को मिलते हैं। उस समय जल के लिए हैंडपंप जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी, इसलिए थारू समाज के लोग इन्हीं कुओं से अपनी जरूरत का पानी निकालते थे। वे खुद कुओं की खुदाई करते और रोजमर्रा के जीवन में इस पानी का इस्तेमाल करते थे। समय के साथ जैसे-जैसे विकास हुआ, थारू समाज के लोगों ने हैंडपंप का इंतजाम कर लिया और उसी का उपयोग करने लगे।

वर्तमान में इन बावन कुओं में से बहुत कम ही ऐसे बचे हैं जो धरातल पर नजर आते हैं। इनमें से अधिकांश मिट्टी से भर चुके हैं, जबकि कई अन्य भी ऐसी ही स्थिति में पहुंच गए हैं।

नेपाल के थारुओं से जुड़ा नाता

मान्यता है कि यहां के बावन कुओं का संबंध सदियों से नेपाल के थारू समुदाय से रहा है। भले ही आज इन कुओं का अस्तित्व लगभग समाप्त हो चुका हो, फिर भी ये अपने भीतर उस दौर के इतिहास को समेटे हुए हैं। थारू समाज लंबे समय से तराई क्षेत्र में रहता आया है और अपनी अलग संस्कृति, परंपरा तथा जीवनशैली के लिए पहचाना जाता है।

जो कुएं आज जमीन में दबकर लुप्त हो चुके हैं, वे कभी थारू समुदाय के दैनिक जीवन का अहम हिस्सा हुआ करते थे। पेयजल, घरेलू जरूरतों की आपूर्ति और दूसरी आवश्यकताओं के लिए ये कुएं बेहद महत्वपूर्ण थे। इतनी बड़ी संख्या में कुओं का निर्माण इस बात की ओर इशारा करता है कि कभी इस क्षेत्र में थारू समुदाय की बड़ी आबादी रहती थी, जो समय के साथ यहां से कहीं और चली गई।

चेतन तिवारी पाबना के उत्तर प्रदेश संवाददाता हैं और राज्य की राजनीति, प्रशासन तथा जमीनी मुद्दों को कवर करते हैं। लखनऊ में रहते हुए वे जिलों से लेकर विधानसभा तक की खबरें संतुलित रिपोर्टिंग के साथ पाठकों तक पहुंचाते हैं। आम लोगों के मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर उनका खास फोकस रहता है।

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