जीवनशैली
एक महीने पहले
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विचारों
छत्तीसगढ़ में मानसून के दस्तक देते ही प्रकृति का नजारा बेहद खूबसूरत हो जाता है। चारों तरफ फैली हरियाली के बीच यहां की पारंपरिक रसोई से उठने वाली खुशबू लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने लगती है। इस मौसम में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में एक बेहद खास और पारंपरिक व्यंजन बनाने की परंपरा है, जिसे छोटी मिक्स मछली की सब्जी कहा जाता है। बरसात के दिनों में जब नदियों, नालों और तालाबों का पानी उफान पर होता है और खेतों तक पहुंच जाता है, तब पानी के साथ कोतरी, लपची और टेंगना जैसी छोटी स्थानीय मछलियां भी खेतों में आ जाती हैं। ग्रामीण इलाकों के लोग इन्हें पकड़ने के लिए खेतों का रुख करते हैं। इन ताजी मछलियों को पकड़कर जब छत्तीसगढ़िया मसालों के साथ पकाया जाता है, तो इसकी खुशबू पूरे घर में महक उठती है।
खेतों से थाली तक का सफर: स्थानीय मछलियों का महत्व
छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति में बरसात के मौसम का यह भोजन केवल एक डिश नहीं बल्कि एक उत्सव की तरह है। मानसून के समय जब खेतों में घुटनों तक पानी भर जाता है, तब कोतरी, लपची और टेंगना जैसी छोटी प्रजाति की मछलियां पानी के बहाव के साथ खेतों में फैल जाती हैं। ग्रामीण लोग इन्हें पकड़ने के लिए पारंपरिक साधनों का इस्तेमाल करते हैं। इन ताजी मछलियों को घर लाकर तुरंत पकाने की तैयारी शुरू हो जाती है। इस व्यंजन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें इस्तेमाल होने वाले मसाले और सामग्रियां पूरी तरह से स्थानीय और पारंपरिक होती हैं, जो इसके स्वाद को कई गुना बढ़ा देती हैं। इसमें खटास के लिए विशेष रूप से आमा खोइला यानी सूखे अमचूर का प्रयोग किया जाता है, जो छत्तीसगढ़ी व्यंजनों की पहचान है।
तैयारी की शुरुआत: मछलियों की सफाई और मैरिनेशन
इस बेहद स्वादिष्ट और पारंपरिक छत्तीसगढ़िया मिक्स मछली को बनाने के लिए तैयारी की शुरुआत बहुत ही ध्यानपूर्वक की जाती है। सबसे पहले पकड़ी गई छोटी मछलियों को पानी से अच्छी तरह धोकर साफ कर लिया जाता है। छोटी मछलियां होने के कारण इनकी सफाई में थोड़ा समय और सावधानी की जरूरत होती है। जब मछलियां अच्छी तरह साफ हो जाएं, तो इनमें स्वादानुसार नमक और हल्दी पाउडर मिलाया जाता है। हल्दी और नमक को मछलियों पर अच्छी तरह से लपेटकर कुछ समय के लिए रख दिया जाता है। ऐसा करने से नमक और हल्दी का स्वाद मछलियों के भीतर तक अच्छी तरह समा जाता है और तलते समय इनका स्वाद और बेहतर हो जाता है।
मछली तलने का पारंपरिक तरीका
मछलियों को मैरिनेट करने के बाद उन्हें तलने की प्रक्रिया शुरू होती है। इसके लिए एक कड़ाही या तवे पर पर्याप्त मात्रा में तेल डालकर उसे अच्छी तरह गर्म किया जाता है। जब तेल पूरी तरह गर्म हो जाए, तब आंच को मध्यम कर दिया जाता है। अब इसमें हल्दी और नमक लगी हुई मछलियों को डाला जाता है। मछलियों को धीमी से मध्यम आंच पर तब तक तला जाता है जब तक कि वे पूरी तरह से सुनहरी और कुरकुरी न हो जाएं। ध्यान रहे कि मछलियां कड़ाही में चिपके नहीं, इसके लिए इन्हें धीरे-धीरे पलटा जाता है। अच्छी तरह से कुरकुरी होने के बाद इन मछलियों को तेल से निकालकर एक अलग बर्तन में रख लिया जाता है।
छत्तीसगढ़िया मसालेदार ग्रेवी बनाने की विधि
इस व्यंजन का असली जादू इसकी ग्रेवी और स्थानीय मसालों में छिपा होता है। छत्तीसगढ़िया स्टाइल में ग्रेवी तैयार करने के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन किया जाता है:
- सबसे पहले कड़ाही में बचे हुए तेल को गर्म करें। इसमें जीरा और बारीक कटी हुई हरी मिर्च का तड़का लगाएं।
- तड़का अच्छे से चटकने के बाद, इसमें पारंपरिक स्वाद के लिए आमा खोइला (सूखा अमचूर) डालें और इसे हल्का सुनहरा होने तक भूनें।
- इसके बाद कड़ाही में पिसा हुआ टमाटर का पेस्ट डालें और ऊपर से थोड़ी सी कसूरी मेथी मिलाएं।
- अब इस मसाले में स्वादानुसार नमक, हल्दी पाउडर, लाल मिर्च पाउडर और स्वादिष्ट गरम मसाला शामिल करें।
- मसाले को तब तक अच्छी तरह से भूनें जब तक कि वह तेल न छोड़ने लगे और टमाटर का कच्चापन पूरी तरह खत्म न हो जाए।
तली हुई मछली और ग्रेवी का संगम
जब मसाला अच्छी तरह पककर तैयार हो जाए और मसालों से बेहतरीन खुशबू आने लगे, तब कड़ाही में अपनी जरूरत के हिसाब से पानी डाला जाता है। पानी डालने के बाद आंच को तेज कर दें और ग्रेवी में एक अच्छा उबाल आने का इंतजार करें। जैसे ही ग्रेवी उबलने लगे, उसमें पहले से तलकर रखी हुई कुरकुरी मछलियों को डाल दें। मछलियों को ग्रेवी में डालने के बाद आंच को धीमा कर दें और इसे लगभग 5 से 7 मिनट तक पकने दें। धीमी आंच पर पकाने से ग्रेवी का तीखा और खट्टा स्वाद मछलियों के अंदर तक अच्छी तरह समा जाता है। जब ग्रेवी गाढ़ी हो जाए और मछलियां पूरी तरह रसदार हो जाएं, तो गैस बंद कर दें।
गरमागरम भात के साथ परोसें
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में इस मिक्स छोटी मछली की सब्जी को परोसने का एक खास तरीका है। इसे आम तौर पर दोपहर के भोजन में गरमागरम भात (उबले हुए चावल) के साथ परोसा जाता है। बरसात के ठंडे मौसम में तीखी, चटपटी और आमा खोइला की खटास से भरपूर यह मछली की सब्जी और गरम भात का कॉम्बिनेशन हर किसी की पहली पसंद बन जाता है। आधुनिकता के इस दौर में भी छत्तीसगढ़ के गांवों में इस पारंपरिक स्वाद और बनाने की अनूठी परंपरा को पूरी तरह सहेज कर रखा गया है, जो आज भी लोगों को अपनी मिट्टी की याद दिलाता है।
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