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एक घंटा पहले
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कुमारसार नदी बनी कांवड़ियों की यात्रा का मुख्य पड़ाव
श्रावणी मेले 2026 के दौरान मुंगेर जिले में एक ऐसी जगह है, जो आस्था और प्रकृति के सुंदर मेल का जीता-जागता उदाहरण पेश कर रही है। यह स्थान है कुमारसार नदी, जो लगभग 26 किलोमीटर लंबे कांवड़िया पथ के अंतिम छोर पर स्थित है। मुंगेर और बांका की सीमा के करीब बहने वाली यह नदी इन दिनों कांवड़ यात्रा पर निकले लाखों भक्तों के लिए आकर्षण और राहत का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। जैसे-जैसे भक्त सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम की ओर बढ़ते हैं, कुमारसार नदी उनके सफर की थकान दूर करने का काम करती है।
बोल बम के नारों से गुंजायमान पूरा मार्ग
कांवड़िया पथ का माहौल इस समय पूरी तरह से शिवमय हो चुका है। कंधे पर रंग-बिरंगे कांवड़ उठाए हुए भक्त जब इस नदी के पास पहुंचते हैं, तो उनके मुख से निकलने वाले बोल बम के जयघोष वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं। लंबी पैदल यात्रा के बाद जब श्रद्धालु कुमारसार नदी के ठंडे पानी में उतरते हैं, तो उनकी शारीरिक थकान एक पल में गायब हो जाती है। यह स्थान न केवल आध्यात्मिक शांति देता है, बल्कि प्रकृति की गोद में आराम करने का अवसर भी प्रदान करता है।
पानी के बीच से गुजरने का सुखद अनुभव
वर्तमान में कुमारसार नदी में पानी का स्तर करीब एक से ढाई फीट के बीच बना हुआ है। जलस्तर इतना अनुकूल है कि कांवड़िए बहुत आसानी से नदी के बीच से गुजर रहे हैं। नदी पार करने के दौरान कई श्रद्धालु पानी में रुककर स्नान करना पसंद करते हैं, ताकि वे तरोताजा होकर अपनी आगे की यात्रा जारी रख सकें। यात्रा के इन यादगार पलों को सहेजने के लिए कई भक्त अपने साथियों के साथ तस्वीरें और वीडियो भी बना रहे हैं। वास्तव में, नदी का यह ठंडा पानी थक चुके कांवड़ियों के लिए किसी प्राकृतिक औषधि से कम नहीं है।
प्रशासन की सतर्कता और सुरक्षा इंतजाम
सुरक्षा के लिहाज से भी प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद है। हालांकि पिछले एक-दो दिनों में नदी का जलस्तर थोड़ा बढ़ा था, लेकिन अधिकारी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। अगर पानी का स्तर बढ़ता है, तो कांवड़ियों को नदी के रास्ते से न भेजकर सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग यानी पुल से भेजने की व्यवस्था की गई है। श्रद्धालुओं का कहना है कि प्रशासन द्वारा इस वर्ष कांवड़िया पथ पर पेयजल और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं का बेहतर प्रबंधन किया गया है। अब तक यात्रा के दौरान किसी भी बड़ी मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ा है, जिससे भक्तों का उत्साह दोगुना हो गया है।
आस्था के सफर में सुकून का एहसास
कांवड़ियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि दिनभर की पैदल दौड़भाग के बाद जब वे कुमारसार नदी की ठंडी धार को महसूस करते हैं, तो उन्हें असीम सुकून मिलता है। उनके चेहरों पर थकान के बजाय बाबा भोलेनाथ के दर्शन करने की खुशी और ऊर्जा स्पष्ट दिखाई देती है। कुल मिलाकर, श्रावणी मेले में कुमारसार नदी उस मुकाम पर है जहां थकान दूर होती है और नई ऊर्जा का संचार होता है। यह नदी आस्था, रोमांच और कुदरती खूबसूरती का एक ऐसा संगम बन गई है, जो हर गुजरते कांवड़िए के सफर को सुखद और यादगार बना रही है।
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