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एक घंटा पहले
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तेहरान की दौड़ और सवालों के घेरे में पाकिस्तान
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के इस संवेदनशील दौर में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर का ईरान की राजधानी तेहरान का दौरा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघेई ने इस आधिकारिक यात्रा की पुष्टि कर दी है। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब पाकिस्तान ने हाल ही में सऊदी अरब और तुर्की के साथ मिलकर एक नए रक्षा गठबंधन का निर्माण किया है, जिसे कई विशेषज्ञ अनौपचारिक तौर पर इस्लामिक NATO के रूप में देख रहे हैं। ऐसे में विश्लेषकों का मानना है कि मुनीर का तेहरान जाना महज एक शिष्टाचार भेंट नहीं, बल्कि इसके पीछे कोई बड़ा भू-राजनीतिक एजेंडा छिपा हो सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की पुरानी कोशिश
ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच एक मध्यस्थ की भूमिका निभाने का प्रयास किया है, हालांकि इसमें उसे आंशिक सफलता ही मिली है। वर्तमान में जब दोनों देशों के बीच संवाद के दरवाजे लगभग बंद हो चुके हैं और अमेरिका ने ईरान के विरुद्ध कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का शंखनाद कर दिया है, तब पाकिस्तानी सेना प्रमुख का वहां पहुंचना कई अर्थ रखता है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, असीम मुनीर तेहरान में ईरानी नेतृत्व के साथ क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा और स्थिरता जैसे गंभीर मुद्दों पर विस्तृत चर्चा करेंगे। इस वार्ता का सबसे प्रमुख बिंदु अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान पर लगाए जाने वाले संभावित नए और सख्त आर्थिक प्रतिबंध होंगे।
अमेरिकी दबाव और होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट
अमेरिका ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह ईरान के खिलाफ इतिहास के सबसे कठिन आर्थिक प्रतिबंध लागू करने जा रहा है। ट्रंप प्रशासन ने उन सभी देशों को कड़ी चेतावनी दी है जो ईरान की किसी भी तरह की आर्थिक सहायता करेंगे। दूसरी ओर, ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की धमकी दी है। वर्तमान में होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही ठप होने के कगार पर है और ईरान ने चेतावनी दी है कि बिना अनुमति इस क्षेत्र से गुजरने वाले किसी भी तेल टैंकर को निशाना बनाया जा सकता है। ऐसे में माना जा रहा है कि पाकिस्तान एक बार फिर अमेरिका और ईरान के बीच संदेशवाहक या दलाल की भूमिका निभाने की कोशिश कर सकता है, ताकि किसी बड़े सैन्य संघर्ष को टाला जा सके। हालांकि, वास्तविकता यह है कि ईरान पहले भी पाकिस्तान की निष्पक्षता पर सवाल उठा चुका है और ट्रंप प्रशासन भी पाकिस्तान को उस स्तर पर विश्वसनीय मध्यस्थ नहीं मानता जैसा पहले माना जाता था।
मक्का रक्षा समझौते का प्रभाव
असीम मुनीर के इस दौरे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू 7 अगस्त 2026 को हुआ मक्का संयुक्त रक्षा समझौता है। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए इस समझौते ने इस्लामिक जगत की सुरक्षा समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। इस रक्षा व्यवस्था में सामूहिक सुरक्षा का प्रावधान है, जिसका अर्थ है कि यदि इन तीनों देशों में से किसी एक पर भी हमला होता है, तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। ईरान के रणनीतिकारों ने इस गठबंधन पर गहरी चिंता जाहिर की है और इसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा माना है।
क्या मुनीर ईरान की आशंकाओं को दूर कर पाएंगे?
तेहरान यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य ईरान की उन आशंकाओं का समाधान करना भी है, जो इस नए सुरक्षा गठजोड़ के बाद पैदा हुई हैं। पाकिस्तान एक तरफ सऊदी अरब और तुर्की के साथ अपने सैन्य और रक्षा सहयोग को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है, तो दूसरी तरफ वह ईरान के साथ भी अपने राजनयिक संबंधों को बनाए रखने का इच्छुक है। असीम मुनीर अपनी इस यात्रा के माध्यम से ईरान को यह आश्वस्त करने का प्रयास कर सकते हैं कि मक्का समझौता ईरान को घेरने या उसे अलग-थलग करने के लिए नहीं है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या तेहरान पाकिस्तान के इस स्पष्टीकरण पर भरोसा करता है या फिर आने वाले दिनों में क्षेत्र में नए समीकरण उभरकर सामने आते हैं।
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