राष्ट्रीय राजनीति
4 घंटे पहले
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प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की लखनऊ जोनल टीम ने सोमवार को उत्तर प्रदेश और हरियाणा में एक साथ बड़ी कार्रवाई की है। जांच एजेंसी की टीमों ने मनी लॉन्ड्रिंग के एक बड़े सिंडिकेट के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद और हरियाणा के फरीदाबाद सहित कुल नौ प्रमुख ठिकानों पर छापेमारी की। यह पूरा सर्च ऑपरेशन प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट यानी PMLA, 2002 के प्रावधानों के तहत दर्ज एक मामले के सिलसिले में चलाया गया। इस कार्रवाई से हड़कंप मच गया है क्योंकि इसमें फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) और शेल कंपनियों के जरिए करोड़ों रुपये के हेरफेर का पर्दाफाश हुआ है।
ईडी की इस छापेमारी का मुख्य उद्देश्य उस संगठित नेटवर्क को ध्वस्त करना है जो बिना किसी सामान या माल की वास्तविक आवाजाही के केवल कागजी हेरफेर कर रहा था। जांच में सामने आया है कि यह सिंडिकेट केवल नकली इनवॉइस और नकली ई-वे बिल तैयार करके करोड़ों रुपये का बोगस टैक्स क्रेडिट हासिल कर रहा था और उसे आगे की कंपनियों में ट्रांसफर कर रहा था।
मेसर्स जंबुद्वीप एक्सपोर्ट्स एंड इंपोर्ट्स लिमिटेड पर गहराया शक
आधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे फर्जीवाड़े के केंद्र में मेसर्स जंबुद्वीप एक्सपोर्ट्स एंड इंपोर्ट्स लिमिटेड नामक कंपनी है। इस कंपनी पर आरोप है कि उसने जाली दस्तावेजों का सहारा लेकर बड़े पैमाने पर बोगस इनपुट टैक्स क्रेडिट हासिल किया। इसके बाद इस फर्जी टैक्स क्रेडिट को दूसरी संबंधित कंपनियों के खातों में भेज दिया गया।
जांचकर्ताओं को पुख्ता संदेह है कि इस कंपनी और इसके नेटवर्क से जुड़ी अन्य सहयोगी संस्थाओं ने मिलकर सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचाया है। कागजों में तो दिखाया गया कि भारी मात्रा में माल की खरीद-फरोख्त हुई है और इसके लिए बाकायदा ई-वे बिल और इनवॉइस भी काटे गए, लेकिन हकीकत में जमीन पर किसी भी सामान का कोई लेनदेन या परिवहन नहीं हुआ था। यह केवल कागजों पर गाड़ियां दौड़ाने का एक अनोखा और शातिर तरीका था।
फंड की लेयरिंग और शेल कंपनियों का इस्तेमाल
ईडी के अधिकारियों के मुताबिक, इस मामले की जांच के दौरान बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इस नेटवर्क ने पैसे के लेन-देन को इतना उलझा दिया था ताकि कानून की नजरों से बचा जा सके। जांच में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें सामने आई हैं:
- सर्कुलर ट्रांजेक्शन: पैसे को आपस में ही कई कंपनियों के खातों में घुमाया जा रहा था ताकि टर्नओवर को असली और बड़ा दिखाया जा सके।
- रैपिड लेयरिंग: रकम को बहुत ही तेजी से एक खाते से दूसरे खाते में ट्रांसफर किया गया ताकि मुख्य स्रोत का पता लगाना बेहद मुश्किल हो जाए।
- फर्जी कंपनियों से कैश निकासी: कई ऐसी कंपनियां बनाई गईं जिनका जमीन पर कोई अस्तित्व ही नहीं था। इन बोगस या शेल कंपनियों के खातों से बाद में मोटी नकदी (कैश) निकाली गई।
इन सभी गतिविधियों से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि फर्जीवाड़े से अर्जित की गई अवैध कमाई को वैध दिखाने और उसे ठिकाने लगाने के लिए शेल कंपनियों (सिर्फ कागजों पर मौजूद कंपनियों) का एक जाल तैयार किया गया था।
करोड़ों रुपये के नुकसान का गणित
इस धोखाधड़ी की गंभीरता का अंदाजा जीएसटी विभाग की प्राथमिक जांच से लगाया जा सकता है। जीएसटी विभाग के अधिकारियों ने अपनी पड़ताल में पाया है कि:
- सिंडिकेट ने कुल 9.63 करोड़ रुपये का इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) गलत और अवैध तरीके से हासिल किया।
- इसके बाद, इस नेटवर्क ने 10.28 करोड़ रुपये के फर्जी टैक्स क्रेडिट को अन्य सहयोगी संस्थाओं को ट्रांसफर या पास कर दिया।
इस तरह सरकारी खजाने को सीधे तौर पर करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचाया गया। मनी लॉन्ड्रिंग कानून (PMLA) के तहत इस तरह के अवैध टैक्स क्रेडिट से कमाए गए पैसे को 'अपराध की कमाई' माना गया है, जिसके आधार पर अब ईडी आगे की कार्रवाई कर रही है।
ईडी की जांच का अगला कदम
इस छापेमारी का मुख्य उद्देश्य केवल आरोपियों को पकड़ना नहीं है, बल्कि इस अवैध नेटवर्क से पैदा हुई बेनामी संपत्ति और धन का पता लगाना भी है। जांच एजेंसी उन सभी लोगों और संस्थाओं की पहचान करने में जुटी है, जिन्हें इस संदिग्ध नेटवर्क के जरिए सीधा या अप्रत्यक्ष वित्तीय लाभ पहुंचा है।
छापेमारी के दौरान ईडी की टीमों ने कई महत्वपूर्ण डिजिटल उपकरण, बही-खाते और संदिग्ध दस्तावेज जब्त किए हैं। इन डिजिटल और कागजी सबूतों के विश्लेषण से जांचकर्ताओं को इस धोखाधड़ी वाले आईटीसी नेटवर्क के पूरे ढांचे को समझने में मदद मिलेगी। साथ ही, ट्रांजेक्शन में शामिल अलग-अलग मुखौटा कंपनियों और उनके पीछे छिपे असली मास्टरमाइंड की भूमिका को भी पूरी तरह से स्पष्ट किया जा सकेगा।
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