पाकिस्तान के प्रतीकों से आज़ादी की तैयारी, बलूचिस्तान में बदले जाएंगे ‘जिन्ना रोड’ और ‘इकबाल रोड’ जैसे नाम पाकिस्तान 3 घंटे पहले 9
बलूचिस्तान गणराज्य ने अपने क्षेत्र से पाकिस्तानी प्रतीकों और नामों को हटाने का फैसला किया है, जिसके तहत सड़कों, सरकारी इमारतों और अस्पतालों के नाम बदलकर बलूच इतिहास से जुड़े महापुरुषों के नाम पर रखे जाएंगे।

बलूचिस्तान से पाकिस्तानी निशान मिटाने का ऐतिहासिक फैसला

पाकिस्तान से अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे बलूच आंदोलनकारियों ने एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है। बलूचिस्तान की अपनी अनूठी और ऐतिहासिक पहचान को दोबारा हासिल करने के उद्देश्य से एक नई मुहिम शुरू की जा रही है। इस मुहिम के तहत बलूचिस्तान के अलग-अलग इलाकों में मौजूद पाकिस्तान से जुड़े तमाम नामों, प्रतीकों और स्मारकों को पूरी तरह से हटा दिया जाएगा। 24 अगस्त 2026 को सामने आई खबरों के अनुसार, बलूचिस्तान गणराज्य ने खुद को एक स्वतंत्र और संप्रभु देश घोषित करते हुए इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने का ऐलान किया है। इस ऐतिहासिक फैसले के तहत अब बलूचिस्तान की सड़कों, सरकारी इमारतों, हवाई अड्डों और अन्य सार्वजनिक स्थलों के नामों की व्यापक समीक्षा की जाएगी और उन्हें बदला जाएगा।

इन प्रसिद्ध नामों को हटाने की है तैयारी

बलूचिस्तान की इस नई योजना के केंद्र में वे नाम हैं जो पाकिस्तान के इतिहास और उसके निर्माताओं से जुड़े हुए हैं। इस नई नीति के तहत प्रमुख रूप से निम्नलिखित नामों की समीक्षा की जाएगी और उन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू होगी:

  • जिन्ना रोड
  • फातिमा जिन्ना रोड
  • इकबाल रोड

इनके अलावा बलूचिस्तान के क्वेटा और अन्य प्रमुख शहरों में स्थित ऐसी तमाम जगहों के नाम बदले जाएंगे जो पाकिस्तान, ब्रिटिश शासन या किसी भी अन्य विदेशी सत्ता के कब्जे की याद दिलाते हैं। बलूच नेताओं का मानना है कि इन बाहरी नामों की जगह बलूचिस्तान के अपने प्राचीन इतिहास, संस्कृति, स्थानीय नायकों और देश के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले शहीदों के नामों को स्थापित किया जाना चाहिए। सोशल मीडिया पर 23 अगस्त 2026 को साझा की गई एक आधिकारिक घोषणा में इस पूरे मामले को लेकर विस्तृत जानकारी दी गई है।

11 अगस्त 1947 की ऐतिहासिक नींव

बलूचिस्तान गणराज्य ने अपने इस बड़े फैसले को ऐतिहासिक तथ्यों के साथ जोड़ते हुए स्पष्ट किया है कि उनकी स्वतंत्रता की असली नींव 11 अगस्त 1947 से जुड़ी हुई है। उनका मानना है कि जब तक कोई देश मानसिक और सांस्कृतिक रूप से अपनी पहचान को स्वतंत्र नहीं करता, तब तक उसकी स्वतंत्रता अधूरी है। इसी वजह से बलूचिस्तान के तमाम महत्वपूर्ण स्थानों के नामों को बदलने की यह कवायद शुरू की गई है। इस समीक्षा प्रक्रिया के तहत केवल सड़कों के नाम ही नहीं बदले जाएंगे, बल्कि बलूचिस्तान के विकास और सार्वजनिक जीवन से जुड़ी लगभग सभी बुनियादी चीजों के नाम बदले जाएंगे।

सिर्फ नाम बदलना नहीं, बल्कि बलूच पहचान की बहाली

बलूच प्रतिनिधियों ने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि यह कदम केवल प्रतीकात्मक रूप से नाम बदलने तक सीमित नहीं है। इसका असली मकसद बलूचिस्तान के राष्ट्रीय चरित्र, उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक गौरव को दोबारा बहाल करना है। इस नीति के तहत निम्नलिखित महत्वपूर्ण क्षेत्रों और संस्थानों के नामों को बलूच राष्ट्रीय पहचान के अनुरूप बदला जाएगा:

  • अस्पताल और चिकित्सा संस्थान
  • हवाई अड्डे और घरेलू एयरलाइंस
  • समुद्री बंदरगाह और राष्ट्रीय राजमार्ग
  • शिक्षण संस्थान, विश्वविद्यालय और सरकारी इमारतें
  • बांध, खनिज परियोजनाएं, तेल के कुएं और गैस क्षेत्र
  • सार्वजनिक पार्क, बैंक, रिसॉर्ट और शॉपिंग मॉल

बलूच नेताओं का स्पष्ट मत है कि एक स्वतंत्र और स्वाभिमानी राष्ट्र की पहचान भी पूरी तरह से स्वतंत्र होनी चाहिए। राजनीतिक रूप से स्वतंत्रता की घोषणा कर देना ही काफी नहीं होता, बल्कि उस स्वतंत्रता की झलक राष्ट्र के इतिहास, उसकी भाषा, उसके प्रतीकों और उसके सार्वजनिक जीवन में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिए।

किसी देश या जनता के खिलाफ नहीं है यह मुहिम

बलूचिस्तान गणराज्य की ओर से जारी बयान में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह पूरी प्रक्रिया किसी भी देश या वहां की आम जनता के खिलाफ नहीं है। इसे किसी द्वेष या नफरत के तहत नहीं किया जा रहा है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से बलूचिस्तान की अपनी राष्ट्रीय पहचान को वापस पाने और उसे संवारने की एक शांतिपूर्ण और गौरवमयी प्रक्रिया है। उनका कहना है कि हर राष्ट्र को अपने इतिहास और अपने नायकों का सम्मान करने का पूरा अधिकार है और बलूचिस्तान भी इसी अधिकार का इस्तेमाल कर रहा है।

नई पीढ़ी को अपने इतिहास से जोड़ने का बड़ा प्रयास

इस व्यापक बदलाव का एक मुख्य उद्देश्य बलूचिस्तान की युवा और आने वाली पीढ़ी को उनके अपने समृद्ध इतिहास और संस्कृति से जोड़ना भी है। बलूच समाज का मानना है कि वर्षों के बाहरी प्रभाव और जबरन थोपे गए नामों के कारण युवा पीढ़ी अपनी वास्तविक जड़ों से दूर होती जा रही है। सार्वजनिक स्थलों और महत्वपूर्ण संस्थानों को स्थानीय बलूच नाम देकर, बच्चों और युवाओं में अपने इतिहास के प्रति गर्व की भावना पैदा की जा सकेगी। इस तरह यह नाम बदलने की प्रक्रिया सड़कों और इमारतों के नाम बदलने से कहीं आगे बढ़कर बलूचिस्तान के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पुनर्जागरण की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम साबित होने वाली है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप