उपनाम: पर्यावरण
थार के तपते रेगिस्तान में संजीवनी बनीं सदियों पुरानी बेरियां, जल संकट से निपटने के लिए शुरू हुई खास मुहिम
बाड़मेर के रेगिस्तानी इलाकों में पारंपरिक जल स्रोतों यानी बेरियों को पुनर्जीवित करने का काम जोरों पर है, जिससे भीषण गर्मी में ग्रामीणों और वन्यजीवों को बड़ी राहत मिल रही है।
जंगल का रक्षक: जानिए क्यों ब्लैक ड्रोंगो को कहा जाता है पक्षियों का कोतवाल
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में पाए जाने वाले ब्लैक ड्रोंगो पक्षी अपनी सतर्कता और अनोखी आवाज के लिए मशहूर हैं। ये न केवल खुद को सुरक्षित रखते हैं, बल्कि अपनी चेतावनी भरी आवाज से अन्य पक्षियों को भी शिकारी जानवरों से बचाते हैं।
मोर सांप क्यों खाता है? इसके पीछे की हैरान कर देने वाली वजह जानकर रह जाएंगे दंग
सागर के बांदरी महाविद्यालय के विशेषज्ञों ने मोर के खान-पान और उनकी आदतों से जुड़े कई अनसुने और रोचक तथ्य सामने रखे हैं।
Gopal Sahni की यादें और 100 साल पुराना बरगद का पेड़, जो आज भी गांव वालों के लिए है संजीवनी
पूर्वी चंपारण में स्थित एक सदी पुराना बरगद का पेड़ आज भी भीषण गर्मी में लोगों को राहत देता है। इस पेड़ को गोपाल Sahni ने लगाया था, जो अब हमारे बीच नहीं रहे।
जामुन की लकड़ी से बनती है सबसे मजबूत नाव, 5 साल तक नहीं सड़ती, पानी भी रहता है साफ
जामुन की लकड़ी का उपयोग नाव बनाने में किया जाता है, जो कि मजबूती और टिकाऊपन के लिए प्रसिद्ध है। यह लकड़ी पानी को साफ रखने में भी मदद करती है और लगभग पांच साल तक सड़ती नहीं है।
ठंड के लिए मशहूर मैनपाट अब गर्मी की चपेट में, 40 डिग्री तापमान से लोग परेशान
छत्तीसगढ़ का शिमला कहलाने वाला मैनपाट कभी अपनी ठंडी आबोहवा के लिए जाना जाता था, लेकिन अब यहां तापमान करीब 40 डिग्री तक पहुंच गया है। बढ़ती गर्मी से लोग एसी-कूलर अपनाने को मजबूर हैं और पर्यटन व स्थानीय कारोबार पर भी असर पड़ा है।
बाजार के केमिकल साबुन-शैम्पू पर भारी पड़ रहा पहाड़ का 'रामबास', नहाने से कपड़े धोने तक हर काम में असरदार
उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के दानपुर क्षेत्र में ग्रामीण और भेड़ पालक आज भी नहाने, बाल धोने और कपड़े साफ करने के लिए रामबास नाम के प्राकृतिक पौधे का इस्तेमाल करते हैं, जो त्वचा, बालों और पर्यावरण तीनों के लिए सुरक्षित माना जाता है।
चूहों के बिल या किसी बड़ी आपदा की आहट? नैनीताल की पहाड़ियों में बढ़ती गतिविधि से सहमे लोग
नैनीताल की पहाड़ियों में चूहों की बढ़ती तादाद और उनके बड़े बिलों ने भूस्खलन का खतरा पैदा कर दिया है। इस अनोखी मुसीबत से निपटने के लिए नगरपालिका कृषि और उद्यान विभाग के साथ मिलकर योजना बना रही है।