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एक घंटा पहले
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विचारों
आर्कटिक में बढ़ रही वैज्ञानिकों की चिंता
आर्कटिक को दुनिया का सबसे ठंडा और बर्फ से ढका इलाका माना जाता है, लेकिन अब यहां बढ़ती गर्मी ने विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। साइंस एडवांसेज़ पत्रिका में प्रकाशित एक ताजा शोध के अनुसार, आर्कटिक क्षेत्र में हो रहा तेजी से बदलाव धरती के सबसे बड़े प्राकृतिक कार्बन भंडार को अस्थिर कर सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि साल 2050 के मध्य तक, यह इलाका वातावरण से कार्बन सोखने के बजाय उसे वापस उत्सर्जित करने लगेगा, जो वैश्विक जलवायु परिवर्तन की समस्या को और गंभीर बना सकता है।
पुराने मॉडलों की सीमाएं और नया सच
अब तक अधिकांश क्लाइमेट मॉडल इस धारणा पर आधारित थे कि आर्कटिक एक स्पंज की तरह काम करेगा जो दुनिया भर की कार्बन डाइऑक्साइड को सोख लेगा। इन पुराने मॉडलों में मुख्य रूप से मिट्टी की ऊपरी परतों का ही अध्ययन किया गया था। हालांकि, नया अध्ययन बताता है कि ये मॉडल जमीन की गहराई में दबे पुराने और भारी मात्रा में मौजूद कार्बन को नजरअंदाज कर रहे थे। शोधकर्ताओं का तर्क है कि गहराई में दबे पीट-लैंड्स और येडोमा डिपॉजिट्स (बर्फ से भरपूर पर्माफ्रॉस्ट) अब इस प्रक्रिया में बड़ी भूमिका निभाएंगे, जो मुख्य रूप से साइबेरिया, कनाडा और अलास्का के हिस्सों में पाए जाते हैं।
क्यों सक्रिय हो रहा है यह कार्बन?
जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, जमी हुई मिट्टी गहराई तक पिघलने लगती है। इस प्रक्रिया में माइक्रोब्स हजारों सालों से जमे हुए पौधों और जैविक सामग्री को तोड़ना शुरू कर देते हैं, जिससे बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें बाहर निकलती हैं। नई रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:
- एक्टिव लेयर का विस्तार: 21वीं सदी के मध्य के बाद जमीन की सक्रिय परत की मोटाई तेजी से बढ़ेगी, जिससे गहराई में जमा कार्बन पूरी तरह उजागर हो जाएगा।
- अचानक पिघलना (Abrupt Thaw): बर्फ का अचानक ढहना और थर्मोकारस्ट झीलों का बनना कार्बन को वातावरण में छोड़ने की प्रक्रिया को और तेज कर देता है।
- गहराई का असर: तीन मीटर से अधिक गहराई में दबे कार्बन के ये भंडार पुराने मॉडलों के आकलन से कहीं ज्यादा संवेदनशील हैं।
धरती के लिए घातक संकेत
पर्माफ्रॉस्ट को एक प्राकृतिक फ्रीजर माना जाता है जो प्राचीन काल से मरे हुए जीवों और पौधों के कार्बन को कैद किए हुए है। शोधकर्ताओं की चेतावनी है कि यदि यह सिलसिला नहीं रुका, तो आर्कटिक जलवायु परिवर्तन को कम करने के बजाय उसे और अधिक गति देगा। अब यह क्षेत्र एक कार्बन सिंक के बजाय कार्बन का एक बड़ा स्रोत बनने की ओर अग्रसर है। यह स्थिति ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने की दुनिया की कोशिशों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है, क्योंकि आर्कटिक का तापमान दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में दो से चार गुना तेजी से बढ़ रहा है।
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