मॉनसून की बेरुखी और रेतीले बवंडर: आसमान से बादल आखिर कहां गायब हो गए? भारत 4 महीने पहले 126
भारत में मॉनसून के अचानक थमने और बादलों के गायब होने के पीछे के वैज्ञानिक कारणों को समझें। जानिए क्यों बारिश की कमी से रेतीले बवंडर उठ रहे हैं और इसका क्लाइमेट चेंज से क्या संबंध है।

मॉनसून का सुस्त पड़ता चक्र

भारत में इस बार मॉनसून की शुरुआत के साथ ही अजीबोगरीब स्थिति देखने को मिल रही है। आसमान में बादल आते तो हैं, लेकिन बरसने से पहले ही ओझल हो जाते हैं। 14 जून तक हालात सामान्य लग रहे थे और सैटेलाइट तस्वीरों में घने बादलों का डेरा था, लेकिन 15 जून को स्थिति पूरी तरह पलट गई। आंकड़ों के मुताबिक, 4 से 15 जून के बीच सामान्य बारिश 53.7 मिमी होनी चाहिए थी, जबकि केवल 19.2 मिमी बारिश ही दर्ज की गई। यानी बारिश में 64% की बड़ी गिरावट देखी गई है।

बादल क्यों गायब हो रहे हैं?

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस लुका-छिपी के पीछे कोई चमत्कार नहीं बल्कि वैज्ञानिक कारक जिम्मेदार हैं:

  • मॉनसून का ब्रेक फेज: बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में हवा के दबाव में बदलाव के कारण मॉनसून की रफ्तार धीमी पड़ गई है।
  • अल नीनो का प्रभाव: प्रशांत महासागर के गर्म होने का 'हैंगओवर' अभी भी भारतीय वायुमंडल पर बना हुआ है, जिससे हवाओं में पर्याप्त नमी नहीं मिल पा रही।
  • एंटी-चक्रवात की स्थिति: उत्तर-पश्चिमी भारत के ऊपर हाई-प्रेशर जोन बनने से हवाएं ऊपर नहीं उठ पा रही हैं, जिससे बादलों का निर्माण रुक गया है।

रेतीले बवंडर और उनका वैज्ञानिक आधार

इन दिनों कई इलाकों में अचानक उठने वाले रेतीले बवंडर चिंता का विषय बने हुए हैं। जब बारिश न होने से मिट्टी पूरी तरह सूखकर पाउडर बन जाती है, तो दोपहर की भीषण गर्मी से गर्म हवाएं तेजी से ऊपर उठती हैं। इस खाली जगह को भरने के लिए आस-पास की हवाएं चक्रवात की तरह घूमती हैं और सूखी मिट्टी को आसमान में उड़ा ले जाती हैं, जिससे धूल का बवंडर बनता है।

क्लाइमेट चेंज और प्रकृति की चेतावनी

इस संकट के पीछे कुछ वैश्विक और स्थानीय कारक भी शामिल हैं:

  • MJO का प्रभाव: मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) चक्र फिलहाल हिंद महासागर से दूर चला गया है, जो मॉनसून को सप्रेस कर रहा है।
  • जेट स्ट्रीम की मनमानी: ग्लोबल वार्मिंग के चलते तेज हवाएं (जेट स्ट्रीम) सामान्य समय पर उत्तर की ओर नहीं खिसकीं, जो ऊपर से गर्म हवाएं नीचे धकेल रही हैं।
  • अर्बन हीट आइलैंड: शहरों में कंक्रीट और इमारतों के कारण बढ़ा हुआ तापमान इन धूल भरे बवंडरों के लिए ईंधन का काम कर रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉनसून का अस्थायी ठहराव हो सकता है, लेकिन यह ग्लोबल वार्मिंग की गंभीर चेतावनी है। गर्म हवाओं की नमी सोखने की क्षमता अधिक होती है, जिसके कारण या तो सूखे जैसे हालात बनते हैं या फिर अचानक 'क्लाउड बर्स्ट' जैसी स्थिति उत्पन्न होती है। यह असंतुलन भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती की ओर इशारा कर रहा है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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