भारत
एक दिन पहले
9
विचारों
एआई और पानी का गहरा संकट
जब भी हम चैटजीपीटी, जैमिनी या किसी अन्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल से कोई प्रश्न पूछते हैं, तो हमें लगता है कि यह महज एक डिजिटल प्रक्रिया है जो पलक झपकते ही पूरी हो गई। हालांकि, इस सुविधा के पीछे एक विशाल और जटिल भौतिक ढांचा काम कर रहा है, जो बड़ी मात्रा में संसाधनों का उपभोग करता है। इनमें सबसे चौंकाने वाला संसाधन पानी है। एआई सिस्टम को संचालित करने वाले विशालकाय डेटा सेंटर्स लगातार चलते रहने के कारण बहुत अधिक गर्मी उत्पन्न करते हैं, जिसे नियंत्रित करने के लिए हर सेकंड भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। यह स्थिति अब वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बनती जा रही है।
संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी और भविष्य की चुनौतियां
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेष ने दुनिया भर की एआई कंपनियों के सामने एक कड़ा रुख अपनाते हुए उनसे बिजली, जमीन और पानी के उपयोग का विस्तृत ब्योरा तलब किया है। संयुक्त राष्ट्र की एक हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि एआई का विकास इसी रफ्तार से जारी रहा, तो अगले चार वर्षों के भीतर एआई के कारण होने वाली बिजली और पानी की खपत दोगुनी हो सकती है। यह भविष्य के लिए एक बड़ा संकट हो सकता है, क्योंकि दुनिया के कई हिस्से पहले ही जल संकट से जूझ रहे हैं।
डेटा सेंटर कैसे गर्म होते हैं और पानी की क्या भूमिका है?
एआई के डेटा सेंटर्स असल में कंप्यूटरों का एक महा-भंडार होते हैं, जहां हजारों शक्तिशाली मशीनें 24 घंटे काम करती हैं। जब आप कोई इनपुट देते हैं, तो ये सर्वर अत्यधिक गणनाएं करते हैं, जिससे वे तेजी से गर्म होने लगते हैं। इन सर्वरों को ठंडा रखने के लिए पानी के दो मुख्य उपयोग किए जाते हैं: पहला, कूलिंग टावर्स के माध्यम से सीधे सर्वर को ठंडा करना, और दूसरा, बिजली उत्पादन केंद्रों पर, जहां से डेटा सेंटर्स को निरंतर ऊर्जा की आपूर्ति की जाती है। जैसा कि वाहनों में रेडिएटर का उपयोग होता है, डेटा सेंटर्स के लिए यह प्रक्रिया लाखों गुना बड़े पैमाने पर होती है।
एक सवाल पर कितना पानी खर्च होता है?
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय और रीवरसाइड के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक महत्वपूर्ण अध्ययन के अनुसार, जब आप एआई से 10 से 50 सामान्य प्रश्नों का एक सेट पूछते हैं, तो डेटा सेंटर को ठंडा करने की प्रक्रिया में लगभग 500 मिलीलीटर यानी आधा लीटर पानी का उपयोग होता है। यदि हम इसे एक अकेले प्रश्न के दृष्टिकोण से देखें, तो एक सवाल के पीछे लगभग 10 से 50 मिलीलीटर पानी खर्च हो जाता है। यह मात्रा लगभग एक से दो चम्मच या फिर एक छोटे शॉट ग्लास के बराबर है। यह आंकड़ा सुनने में छोटा लग सकता है, लेकिन दुनिया भर में अरबों लोगों द्वारा हर दिन पूछे जाने वाले करोड़ों सवालों के हिसाब से यह खपत लाखों लीटर तक पहुंच जाती है।
डेटा सेंटर्स में पानी के खर्च की प्रक्रिया
डेटा सेंटर्स में पानी का उपयोग मुख्य रूप से दो चरणों में होता है:
- वाष्पीकरण (Evaporation): सर्वर से उत्पन्न प्रचंड गर्मी को सोखने के लिए कूलिंग टावर्स का इस्तेमाल किया जाता है। यहां पानी का उपयोग गर्मी को खत्म करने के लिए होता है, जिसके बाद पानी भाप बनकर हवा में उड़ जाता है। यह पानी तुरंत दोबारा उपयोग करने योग्य नहीं रह जाता।
- अप्रत्यक्ष खपत (Indirect Consumption): डेटा सेंटर्स को चलाने के लिए विशाल मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है। जिन पावर प्लांट्स से यह बिजली आती है, उन्हें ठंडा रखने के लिए लाखों लीटर पानी की जरूरत पड़ती है, जिसे अप्रत्यक्ष पानी की खपत के रूप में गिना जाता है।
टेक कंपनियों की प्रतिक्रिया और सुधार
गूगल जैसी बड़ी कंपनियां इस पानी की खपत को लेकर अब गंभीर हो गई हैं और लगातार तकनीक में सुधार कर रही हैं। वे अब पीने योग्य साफ पानी के स्थान पर रीसायकल किए हुए पानी या औद्योगिक पानी का उपयोग कर रही हैं। इसके अलावा, कई कंपनियां अपने डेटा सेंटर्स को फिनलैंड या आयरलैंड जैसे ठंडे देशों में स्थापित कर रही हैं, ताकि प्राकृतिक रूप से उपलब्ध ठंडी हवा से ही सर्वर को ठंडा रखा जा सके। गूगल ने 'नेट-ज़ीरो' का लक्ष्य रखा है, जिसके तहत वे जितना पानी उपयोग करेंगे, उससे कहीं अधिक पानी पर्यावरण को वापस लौटाने का संकल्प ले रहे हैं।
कानूनी स्थिति: अमेरिका और भारत
अमेरिका जैसे देशों में फिलहाल एआई डेटा सेंटर्स की पानी की खपत पर कोई सख्त संघीय कानून नहीं है, हालांकि कुछ राज्य सक्रिय हो रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, मिनासोटा में यदि कोई डेटा सेंटर सालाना 10 करोड़ गैलन यानी लगभग 38 करोड़ लीटर से ज्यादा पानी इस्तेमाल करता है, तो उन्हें सरकार से पहले अनुमति लेनी होती है। भारत की स्थिति की बात करें, तो राष्ट्रीय स्तर पर अभी डेटा सेंटर्स के लिए कोई विशेष पानी नीति नहीं है। तेलंगाना, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्य अपनी नीतियों में जल संरक्षण को प्रोत्साहन तो दे रहे हैं, लेकिन कठोर पाबंदियां अब भी नदारद हैं। बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई जैसे शहर, जो पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं, वहां इन डेटा सेंटर्स का तेजी से विस्तार पर्यावरणविदों के लिए गहरी चिंता का विषय है। यदि एआई का विकास इसी तरह जारी रहा, तो 2027 तक अरबों लीटर अतिरिक्त पानी केवल एआई की प्यास बुझाने में खर्च हो जाएगा।
Comments
0 comment