सावन की फुहारों के बीच राजस्थान के इस पारंपरिक पकवान की धूम, हर तरफ बढ़ी मांग जीवनशैली 2 घंटे पहले 5
सावन के महीने में राजस्थान की खास मिठाई घेवर का स्वाद बारिश के साथ दोगुना हो जाता है। महिलाओं की पहली पसंद बनी इस कुरकुरी मिठाई की मांग बाजार में इन दिनों चरम पर है।

राजस्थान की सावन स्पेशल मिठाई का जादू

राजस्थान का खानपान अपनी अनूठी परंपराओं के लिए पूरे देश में मशहूर है। यहां का हर मौसम अपने साथ स्वाद का एक नया रंग लेकर आता है। जहां गर्मी के मौसम में ठंडी मिठाइयों को प्राथमिकता दी जाती है, वहीं सर्दी आते ही गर्म तासीर वाले पारंपरिक व्यंजनों की मांग बढ़ जाती है। हालांकि, जब बात सावन और रिमझिम बारिश के मौसम की हो, तो एक नाम सबसे पहले जुबां पर आता है और वह है घेवर। राजस्थान में घेवर केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि सावन का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है। बारिश की बूंदों के साथ इसका कुरकुरापन लोगों को खूब लुभाता है, यही कारण है कि मिठाई के बाजारों में इसकी जबरदस्त रौनक देखने को मिल रही है।

देखने में लाजवाब, स्वाद में बेमिसाल

घेवर की पहचान उसकी मधुमक्खी के छत्ते जैसी जालीदार बनावट और उसके ऊपर जमी चाशनी की मीठी परत से होती है। यह मिठाई देखने में जितनी आकर्षक और सुंदर लगती है, स्वाद में उतनी ही लाजवाब होती है। सावन के आते ही मिठाई की दुकानों पर इसकी मांग में अचानक भारी उछाल देखा जाता है। महिलाओं के बीच इस मिठाई को लेकर एक विशेष प्रकार का उत्साह और क्रेज बना रहता है, जो इसे इस मौसम की सबसे चर्चित मिठाई बनाता है।

बारिश और घेवर का अटूट रिश्ता

घेवर को राजस्थान की बारिश की खास पहचान कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा। पारंपरिक विधि से तैयार किए जाने वाले घेवर की खस्ता और कुरकुरी बनावट इसे अन्य मिठाइयों से अलग खड़ा करती है। बरसात के खुशनुमा मौसम में जब ठंडी हवाएं चलती हैं, तब गरमागरम या ठंडे घेवर का स्वाद और भी अधिक बढ़ जाता है। सावन के दौरान मिठाइयों के बाजारों में इसकी भारी मांग रहती है, जिसे पूरा करने के लिए दुकानदार विशेष तैयारी करते हैं।

कारीगरों की मेहनत और बढ़ती वैरायटी

करौली के प्रसिद्ध हलवाई विनोद गर्ग का मानना है कि इस मिठाई की बनावट काफी हद तक मौसम पर निर्भर करती है। वातावरण में मौजूद नमी और ठंडक घेवर को एकदम सही आकार और खस्तापन देने में मदद करती है। यही वजह है कि जैसे ही सावन की शुरुआत होती है, मिठाई की दुकानों पर कारीगर दिन-रात घेवर बनाने में व्यस्त हो जाते हैं। बाजार में केवल सादा घेवर ही नहीं, बल्कि मलाई घेवर और मावे वाले घेवर की भी भारी मांग रहती है, जिसे लोग बेहद चाव से खरीदते हैं।

तीज-त्योहारों और परंपराओं से जुड़ा घेवर

राजस्थान में तीज और सावन के पर्वों के साथ घेवर का रिश्ता काफी पुराना है। हरियाली तीज के अवसर पर महिलाएं न केवल इसे खुद खाती हैं, बल्कि एक-दूसरे को भेंट स्वरूप भी देती हैं। आज भी राजस्थान के कई हिस्सों में मायके से ससुराल घेवर भेजने की परंपरा जीवित है। सावन के महीने में जब बाजार घेवर की मीठी खुशबू से महक उठते हैं, तो लोग खुद को इसे खरीदने से रोक नहीं पाते। कई लोग तो साल भर सावन की बारिश और घेवर के आने का बेसब्री से इंतजार करते हैं।

महिला वर्ग की पहली पसंद

घेवर की खासियत यह है कि इसका असली और बेहतरीन स्वरूप सावन की बारिश के दौरान ही निखर कर आता है। इस मौसम का मिठाई कारोबारी भी साल भर इंतजार करते हैं, क्योंकि सावन, तीज और रक्षाबंधन के समय इसकी बिक्री में कई गुना बढ़ोतरी हो जाती है। सबसे विशेष बात यह है कि घेवर महिलाओं की सबसे पसंदीदा मिठाइयों की सूची में शीर्ष पर रहता है। यद्यपि अब बड़े शहरों में घेवर साल भर उपलब्ध होने लगा है, लेकिन करौली जैसे क्षेत्रों में आज भी घेवर का असली आनंद केवल बारिश और सावन के महीने में ही लिया जा सकता है, जो इसे और भी खास बनाता है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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