हादसे ने बदली राह: मंदिर में दो बच्चों से शुरू हुआ सफर, आज हजारों का सहारा बनीं सुशीला बोहरा राजस्थान 2 घंटे पहले 2
पति की दृष्टि और फिर उनके निधन के बाद टूटने के बजाय समाजसेवा का रास्ता चुनने वाली सुशीला बोहरा ने 1977 में दो नेत्रहीन बच्चों के साथ संस्थान की नींव रखी थी, जो आज सैकड़ों बच्चों का सहारा है।

पाली और जोधपुर में अनगिनत दिव्यांग, मूक-बधिर, दृष्टिबाधित और अनाथ बच्चों की जिंदगी में उजाला भरने वाली सुशीला बोहरा आज पूरे मारवाड़ क्षेत्र के लिए प्रेरणा का नाम बन चुकी हैं। एक गृहिणी से लेकर हजारों बच्चों की संरक्षक बनने तक का उनका सफर संघर्ष और सेवा की अनूठी मिसाल है।

निजी त्रासदी से सेवा की ओर

जीवन ने सुशीला बोहरा के सामने कठिन परीक्षा रखी। पहले उनके पति की आंखों की रोशनी चली गई और बाद में उनका निधन हो गया। ऐसे कठिन समय में हार मान लेना स्वाभाविक होता, लेकिन उन्होंने इसके उलट रास्ता चुना। दुख को ताकत में बदलते हुए उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज की सेवा को समर्पित कर दिया।

मंदिर से शुरू हुई शुरुआत

उनका यह सफर बेहद छोटे स्तर से शुरू हुआ। वर्ष 1977 में उन्होंने सिर्फ दो नेत्रहीन बच्चों को साथ लेकर 'नेत्रहीन विकास संस्थान' की नींव रखी। जो पहल कभी दो बच्चों से आरंभ हुई थी, वह आज एक बड़े आश्रय में बदल चुकी है।

सैकड़ों बच्चों को मुफ्त सुविधाएं

आज यह संस्थान सैकड़ों बच्चों को निःशुल्क शिक्षा, रहने की व्यवस्था और भोजन उपलब्ध करा रहा है। जरूरतमंद और बेसहारा बच्चों के लिए यह संस्थान किसी परिवार से कम नहीं है, जहां उन्हें न सिर्फ सुरक्षा बल्कि बेहतर भविष्य की राह भी मिलती है।

राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान

सुशीला बोहरा के इन सेवा कार्यों को बड़े स्तर पर सराहा गया है। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है, जो उनके समर्पण और निःस्वार्थ सेवा भाव की पहचान है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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