उपनाम: मारवाड़
हादसे ने बदली राह: मंदिर में दो बच्चों से शुरू हुआ सफर, आज हजारों का सहारा बनीं सुशीला बोहरा
पति की दृष्टि और फिर उनके निधन के बाद टूटने के बजाय समाजसेवा का रास्ता चुनने वाली सुशीला बोहरा ने 1977 में दो नेत्रहीन बच्चों के साथ संस्थान की नींव रखी थी, जो आज सैकड़ों बच्चों का सहारा है।
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3 घंटे पहले