मखाना बना 'सफेद सोना', जीआई टैग से बदली किस्मत; दरभंगा में 750 किसान कर रहे खेती, एक बीघा में डेढ़ लाख तक मुनाफा बिहार एक महीने पहले 16
मिथिलांचल के तालाबों में उगने वाला मखाना जीआई टैग मिलने के बाद किसानों के लिए 'सफेद सोना' साबित हो रहा है। पारंपरिक धान-गेहूं छोड़कर किसान अब इस सुपरफूड की खेती से कई गुना ज्यादा कमाई कर रहे हैं।

मिथिलांचल के तालाबों में उगने वाला मखाना अब इस इलाके के किसानों के लिए 'सफेद सोना' बन चुका है। जीआई टैग मिलने के बाद इस फसल की तस्वीर और किसानों की तकदीर, दोनों ही बदल गई हैं। यही वजह है कि किसान पारंपरिक धान और गेहूं की खेती छोड़कर तेजी से मखाने की ओर रुख कर रहे हैं, क्योंकि इसमें कई गुना अधिक मुनाफा मिल रहा है।

20 बीघा में खेती, संगठन से जुड़े 750 किसान

दरभंगा के प्रगतिशील किसान प्रदीप कुमार इसकी जीती-जागती मिसाल हैं। उन्होंने करीब 20 बीघा में मखाने की खेती कर रखी है। प्रदीप 'श्री मिथिला मखाना किसान उत्पादक संघ' के सचिव भी हैं और उनके इस संगठन से 750 किसान जुड़े हुए हैं। अकेले बहादुरपुर प्रखंड में ही करीब 1000 एकड़ में मखाने की खेती कराई गई है।

कभी थर्माकोल कहकर उड़ाते थे मजाक

प्रदीप पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि चार साल पहले हालात बिल्कुल अलग थे। उस समय 150 से 200 रुपये किलो के भाव पर भी मखाने को कोई खास पूछने वाला नहीं था।

हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे शहरों में लोग इसे थर्माकोल कहकर इसका मजाक उड़ाते थे। खाने में भी लोगों की ज्यादा दिलचस्पी नहीं रहती थी।

जीआई टैग से मिली 'सुपरफूड' की पहचान

जीआई टैग मिलने के बाद मखाने को एकदम नई पहचान मिल गई। आज इसे 'सुपरफूड' कहा जाता है और डॉक्टर भी कई बीमारियों में इसे खाने की सलाह देते हैं। मखाने में कैल्शियम, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस जैसे मिनरल्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो दिल, हड्डियों और शुगर के मरीजों के लिए फायदेमंद माने जाते हैं।

कितना खर्च, कितनी कमाई

प्रदीप के मुताबिक, एक बीघा मखाने की खेती में लगभग 50 हजार रुपये का खर्च आता है। अगर बाजार में अच्छा रेट मिल जाए तो डेढ़ लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमाया जा सकता है। यह आमदनी कच्ची 'गुड़िया' बेचने पर है। अगर किसान खुद पॉपिंग करवाकर लावा तैयार कर बेचें, तो कमाई और भी बढ़ सकती है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच, बढ़ा निर्यात

जीआई टैग ने मिथिला के मखाने को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचा दिया है। अब इसका निर्यात बढ़ा है और किसानों को बेहतर दाम भी मिल रहे हैं। यही कारण है कि युवा किसान भी तेजी से इस खेती से जुड़ रहे हैं। तालाब, गड्ढे और जलजमाव वाली जिन जमीनों पर पहले कुछ नहीं उगता था, वहां अब लहलहाती मखाने की खेती हो रही है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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