बिहार के इस गांव के पहले BPSC शिक्षक बने थे नागेश्वर दास, बिना TET और B.Ed के ऐसे मिली थी नौकरी बिहार एक दिन पहले 9
आज के दौर में शिक्षक बनने के लिए तमाम परीक्षाएं और प्रशिक्षण जरूरी हैं, लेकिन गया जिले के बिशुनपुर गांव के नागेश्वर दास और उनकी पत्नी यमुना कुमारी ने उस दौर में सफलता हासिल की थी जब ये प्रक्रियाएं नहीं थीं। बीपीएससी के माध्यम से चयनित यह दंपती आज शिक्षा जगत के लिए प्रेरणा बने हुए हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में एक अनूठी मिसाल

बिहार के गया जिले के बांकेबाजार प्रखंड में स्थित बिशुनपुर गांव आज शिक्षा के एक खास अध्याय के लिए चर्चा में है। यहाँ के निवासी और सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक नागेश्वर दास ने अपने जीवन के 31 वर्ष शिक्षा विभाग को समर्पित किए हैं। हाल ही में अपनी सेवा पूरी कर रिटायर हुए नागेश्वर दास न केवल अपने गांव के पहले ऐसे शिक्षक हैं जिन्होंने बीपीएससी के माध्यम से सरकारी नौकरी प्राप्त की, बल्कि यह उपलब्धि उन्होंने अपनी पत्नी यमुना कुमारी के साथ साझा की थी। साल 1994 में जब पहली बार बीपीएससी ने बड़े पैमाने पर शिक्षकों की भर्ती की थी, तब इस पति-पत्नी की जोड़ी ने न केवल परीक्षा पास की बल्कि पूरे क्षेत्र में एक मिसाल पेश की थी।

शिक्षक चयन का बदलता स्वरूप

नागेश्वर दास के अनुसार, आज के दौर में शिक्षक बनने के लिए जिस तरह के पात्रता मानदंड जैसे TET, CTET और B.Ed अनिवार्य हैं, उस समय ऐसी व्यवस्था नहीं हुआ करती थी। बिशुनपुर गांव में नागेश्वर दास से पहले भी दो शिक्षक कार्यरत थे, जिनका नाम स्वर्गीय बैजनाथ प्रसाद और स्वर्गीय कृष्णदेव प्रसाद सिंह था। उन दिनों शिक्षकों की नियुक्ति शैक्षणिक योग्यता जैसे मैट्रिक और इंटर की डिग्रियों के साथ-साथ जिला स्तर पर बने एक प्रशिक्षित पैनल के आधार पर की जाती थी। उस समय चयन प्रक्रिया में लिखित प्रतियोगी परीक्षा के बजाय वरिष्ठता और ट्रेनिंग को अधिक महत्व दिया जाता था। इस लिहाज से नागेश्वर दास बीपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले गांव के पहले शिक्षक बने।

गरीबी से सफलता तक का संघर्षपूर्ण सफर

एक बेहद साधारण और गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले नागेश्वर दास का बचपन चुनौतियों से भरा रहा। उनके पिता कोलकाता की एक प्राइवेट जूट मिल में काम करते थे। हालांकि, बाद में उनकी माताजी के कहने पर उनके पिता वापस गांव लौट आए और खेती-किसानी में लग गए। वर्ष 1977-78 में जब बिहार में पहली बार पंचायत चुनाव हुए, तो उनके पिता गांव के सरपंच निर्वाचित हुए। सीमित संसाधनों के बावजूद नागेश्वर दास ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और सरकारी नौकरी की तलाश में जुटे रहे। 1994 की उस ऐतिहासिक शिक्षक बहाली परीक्षा में उन्होंने अपनी पत्नी यमुना कुमारी के साथ सफलता हासिल की। उन्होंने बताया कि उस दौरान शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया में दो चरणों की परीक्षा होती थी, जिसमें प्री परीक्षा पूरी तरह से ऑब्जेक्टिव होती थी, जबकि मेंस परीक्षा सब्जेक्टिव थी, जिसमें कठिन सवालों का सामना करना पड़ता था।

शिक्षण पद्धतियों में नवाचार का योगदान

अपनी 31 साल की लंबी सेवा के दौरान नागेश्वर दास ने शिक्षा के प्रति बेहद समर्पण दिखाया। उनकी पहली पोस्टिंग गया जिले के अतरी प्रखंड में हुई थी। उन्होंने सबसे पहले बच्चों को 'खेल-खेल में शिक्षा' देने की पद्धति को अपनाकर स्कूलों में पढ़ाई को रोचक बनाया। उन्होंने जो प्रयोग उस समय शुरू किए थे, आज वे बिहार के अधिकांश सरकारी स्कूलों की गतिविधियों का हिस्सा बन चुके हैं। उन्होंने शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से जिला और राज्य स्तर पर कई सम्मान प्राप्त किए हैं।

प्रधानाध्यापक के रूप में ड्रेस कोड की अनूठी पहल

वर्ष 2022 में जब नागेश्वर दास को प्रधानाध्यापक के पद पर पदोन्नति मिली, तो उन्होंने एक साहसिक कदम उठाते हुए अपने विद्यालय में शिक्षकों और नॉन-टीचिंग स्टाफ के लिए एक निश्चित ड्रेस कोड लागू किया। गया जिले में वे ऐसे पहले शिक्षक थे जिन्होंने यह नई परिपाटी शुरू की थी। इस पहल के लिए उन्हें राज्य स्तर पर सम्मानित भी किया गया। आज भी मध्य विद्यालय मोनेया में सभी कर्मचारी ड्रेस कोड का पालन करते हैं। नागेश्वर दास का मानना है कि अनुशासन शिक्षा का आधार है और उन्होंने राज्य सरकार से यह मांग की है कि शिक्षकों के लिए ड्रेस कोड को पूरे बिहार में अनिवार्य किया जाए। आज भी उनकी पत्नी यमुना कुमारी बच्चों को शिक्षा देने का कार्य निरंतर जारी रखे हुए हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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