नॉनवेज प्रेमियों का 'ब्लैक डायमंड' कड़कनाथ: कहां से शुरू हुआ सफर और कैसे करा रहा मोटी कमाई मध्य प्रदेश एक घंटा पहले 1
पूरी तरह काले मांस, त्वचा और हड्डियों वाला कड़कनाथ मुर्गा देशभर में नॉनवेज शौकीनों की पहली पसंद बनता जा रहा है। प्रोटीन से भरपूर और लो-कोलेस्ट्रॉल होने के कारण इसकी कीमत आम चिकन से कई गुना ज्यादा है।

नॉन-वेज के शौकीन जब भी किसी रेस्टोरेंट या दुकान पर पहुंचते हैं तो उनके मन में सबसे पहला सवाल यही उठता है कि चिकन की क्वालिटी और वैराइटी कौन सी है। जवाब में अक्सर ब्रॉयलर और देसी चिकन का ही नाम सुनने को मिलता है, लेकिन इनसे अलग एक और बेहद खास किस्म भी मौजूद है। भारतीय पोल्ट्री बाजार में मौजूद इस 'ब्लैक डायमंड' का नाम है कड़कनाथ। पहली बार सुनने पर यकीन करना मुश्किल होता है कि किसी मुर्गे का मांस, त्वचा और यहां तक कि हड्डियां भी पूरी तरह काली हो सकती हैं, लेकिन यही कड़कनाथ की सबसे बड़ी पहचान है। देशभर में इसकी मांग दिन-ब-दिन तेजी से बढ़ रही है। आइए जानते हैं कि आखिर इस अनोखे मुर्गे की शुरुआत कहां से हुई।

कहां हुई कड़कनाथ मुर्गे की उत्पत्ति?

इस जादुई मुर्गे का इतिहास मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के झाबुआ और धार जिलों से जुड़ा हुआ है। इन जिलों के दूर-दराज के आदिवासी इलाकों में सदियों से इस नस्ल को पाला जाता रहा है। स्थानीय भील और भिलाला जनजाति के परिवारों के जीवन और संस्कृति में कड़कनाथ हमेशा से गहराई से रचा-बसा रहा है। यहां के लोग इसे प्यार से 'काली मासी' भी पुकारते हैं, जिसका अर्थ होता है काले मांस वाली मुर्गी। इसके पूरे शरीर और मांस का गहरा काला रंग इसमें मौजूद 'मेलेनिन' नामक प्राकृतिक तत्व की अधिकता की वजह से होता है, जो इसे दुनिया की बाकी नस्लों से बिल्कुल अलग बनाता है।

तीन अलग नस्लें और भौगोलिक पहचान

देखने में भले ही यह केवल काले रंग का दिखे, लेकिन कड़कनाथ की भी तीन अलग-अलग नस्लें होती हैं। पहली पूरी तरह गहरी काली, दूसरी सुनहरी और तीसरी पेंसिलनुमा किस्म है। इन तीनों के बीच का फर्क उनके पंखों की बनावट और बाहरी रूप-रंग से समझा जा सकता है, हालांकि तीनों के औषधीय गुण और स्वाद में कोई अंतर नहीं होता। कड़कनाथ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह बेहद मजबूत जान वाला होता है और किसी भी मौसम या कठिन हालात में आसानी से ढल जाता है। इसी खासियत और झाबुआ क्षेत्र की इस अनमोल धरोहर को सहेजने के मकसद से भारत सरकार ने 30 जुलाई 2018 को कड़कनाथ के मांस को जीआई टैग की विशेष मान्यता दी थी। इतना ही नहीं, झाबुआ प्रशासन ने इसे अपनी एक जिला एक उत्पाद योजना में भी शामिल किया है।

सेहत के खजाने से होती है मोटी कमाई

कड़कनाथ सिर्फ स्वाद में ही अव्वल नहीं है, बल्कि सेहत के लिहाज से भी यह एक बेहतरीन खजाना है। आम चिकन की तुलना में इसके मांस में प्रोटीन की मात्रा कहीं अधिक होती है, जबकि फैट या चर्बी न के बराबर यानी यह लो-कोलेस्ट्रॉल होता है। यही वजह है कि डॉक्टर भी दिल के मरीजों, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज से जूझ रहे लोगों को इसके सेवन की सलाह देते हैं। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी कारगर साबित होता है।

सेहत के लिए इतना फायदेमंद होने के चलते बाजार में इसकी कीमत आम चिकन से कई गुना अधिक रहती है। इसी भारी मांग और ऊंचे दामों की वजह से अब देशभर के किसान इसके पालन की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में पोल्ट्री फार्मिंग के जरिए लोग बंपर मुनाफा कमा रहे हैं। कहा जाता है कि इसकी फार्मिंग करने वाले लोगों को लाखों का मुनाफा होता है। कड़कनाथ मुर्गे की कीमत ₹400 से ₹800 प्रति किलोग्राम से लेकर ₹1000 रुपये प्रति किलोग्राम तक होती है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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