भोजपुर की बेटी की मेहनत रंग लाई, विलुप्त होती पीडिया-लेखन कला को मिला GI टैग बिहार 2 महीने पहले 48
बिहार की पारंपरिक पीडिया-लेखन कला को आधिकारिक तौर पर जीआई टैग मिल गया है। भोजपुर के जगदीशपुर की कलाकार विनीता कुमारी के अथक प्रयासों ने इस लुप्त होती लोक-कला को नई पहचान दिलाई।

बिहार की समृद्ध लोक-संस्कृति और पारंपरिक कला के इतिहास में एक और सुनहरा अध्याय जुड़ गया है। राज्य की ऐतिहासिक पीडिया-लेखन कला को बिहार सरकार के प्रयासों के बाद अब आधिकारिक रूप से जीआई (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) टैग प्रदान कर दिया गया है। यह सिर्फ एक लोक-कला को मिली पहचान भर नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों की उस अनमोल सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है, जिसे सदियों से महिलाएं अपने हुनर और परंपरा के बल पर जीवित रखती आई हैं।

विशिष्ट पहचान और कानूनी संरक्षण

जीआई टैग मिलने के बाद अब इस लोक-कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान और कानूनी सुरक्षा हासिल होगी। इससे जहां कला के मूल स्वरूप को सहेजने में मदद मिलेगी, वहीं बिहार की सांस्कृतिक पहचान भी वैश्विक मंच पर और अधिक मजबूती से उभरेगी।

सांस्कृतिक परंपराओं का जीवंत दस्तावेज

पीडिया-लेखन की यह परंपरा भाई-बहन के पवित्र रिश्ते, उनके अटूट स्नेह और भाई की दीर्घायु की कामना से गहराई से जुड़ी हुई है। इस कला की खास बात यह है कि ग्रामीण महिलाएं अपने जीवन, आस्था और सामाजिक मूल्यों को प्रतीकों के जरिए दीवारों पर उकेरती हैं।

त्योहारों और विशेष अवसरों पर घरों की कच्ची दीवारों पर गोबर और मिट्टी का लेप चढ़ाकर प्राकृतिक रंगों से सुंदर आकृतियां बनाई जाती हैं। इन चित्रों में सूर्य, चंद्रमा, पेड़-पौधे, पक्षी, डोली और मानव आकृतियां प्रमुखता से दिखाई देती हैं। ये केवल कलाकृतियां नहीं, बल्कि लोकजीवन, प्रकृति और सांस्कृतिक परंपराओं के जीवंत दस्तावेज हैं।

परंपरा को बचाने का संकल्प

इस पारंपरिक कला को लुप्त होने से बचाने और आधुनिक दौर में नई पहचान दिलाने में भोजपुर जिले के जगदीशपुर की कलाकार विनीता कुमारी की भूमिका बेहद अहम रही है। बचपन में अपनी मां को पीडिया-लेखन करते देखकर उन्होंने इस कला को करीब से समझा और आत्मसात किया।

समय के साथ जब कच्चे घरों की जगह पक्के मकान लेने लगे, तो यह लोक-कला धीरे-धीरे दम तोड़ने लगी। ऐसे कठिन समय में विनीता कुमारी ने इसे सहेजने और जीवित रखने का संकल्प लिया।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान

विनीता कुमारी ने पीडिया-लेखन को केवल दीवारों तक सीमित न रखते हुए इसे कैनवास, कागज और अन्य आधुनिक माध्यमों से जोड़ा। उनके प्रयासों की बदौलत यह कला गांवों के आंगनों से निकलकर प्रदर्शनियों, सांस्कृतिक आयोजनों और शैक्षणिक शोध का हिस्सा बन गई। उनकी निरंतर मेहनत ने इस कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई।

कला के मूल स्वरूप का संरक्षण

विनीता कुमारी का मानना है कि जीआई टैग मिलने से पीडिया-लेखन कला के मूल स्वरूप का संरक्षण संभव होगा। इससे जुड़े कलाकारों को उचित सम्मान, पहचान और रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे।

यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि लोक-कलाएं केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि समाज की जीवंत सांस्कृतिक आत्मा हैं। सरकार की पहल और कलाकारों के समर्पण ने बिहार की इस अनमोल कला को नया जीवन दिया है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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