क्या भूत-प्रेत वाकई होते हैं या यह सिर्फ दिमाग की उपज है? मनोवैज्ञानिक की चौंकाने वाली व्याख्या बिहार एक घंटा पहले 2
मनोवैज्ञानिक इंजीनियर आर शंकर के अनुसार भूत दिखने के दावे असल में हैलुसिनेशन हैं, जो शिजोफ्रेनिया, बाइपोलर डिसऑर्डर और PTSD जैसी मानसिक बीमारियों से जुड़े होते हैं।

बेगूसराय समेत बिहार के कई इलाकों में हाईवे, भूतों का मेला और तथाकथित भूतिया स्थानों से जुड़ी अनेक कहानियाँ सुनने और देखने को मिलती हैं। हर जगह हजारों लोग यह दावा करते नजर आते हैं कि फलाँ स्थान भूतिया और जानलेवा है। कई लोग खुद को इस बात का गवाह बताते हैं कि उन्होंने देखा है कि किस तरह भूत किसी की जान ले लेता है। लेकिन क्या वास्तव में भूत-प्रेत का अस्तित्व है? और अगर नहीं, तो फिर लोगों को ये दिखाई क्यों देते हैं? इन्हीं सवालों का जवाब चर्चित मनोवैज्ञानिक इंजीनियर आर शंकर ने तर्कों और उदाहरणों के साथ दिया है।

भूत-प्रेत को लेकर मनोविज्ञान का नजरिया

भूत-प्रेत, आत्मा और अदृश्य शक्तियों को लेकर समाज में लंबे समय से तरह-तरह की मान्यताएँ चली आ रही हैं। बहुत से लोग दावा करते हैं कि उन्होंने भूत देखा है या किसी अनजानी शक्ति को महसूस किया है। मगर इंजीनियर आर शंकर का स्पष्ट कहना है कि मनोविज्ञान और मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान में भूत-प्रेत जैसी किसी भी चीज की कोई मान्यता नहीं है।

आखिर क्यों दिखाई देते हैं भूत-प्रेत?

आर शंकर बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि उसे भूत दिखा या किसी अदृश्य व्यक्ति की आवाज सुनाई दी, तो इसके पीछे अक्सर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ हो सकती हैं। मनोविज्ञान में इस अवस्था को हैलुसिनेशन कहा जाता है। हैलुसिनेशन का अर्थ है ऐसी चीजों को देखना, सुनना या महसूस करना, जो वास्तव में मौजूद ही नहीं होतीं। ऐसे व्यक्ति को पूरा यकीन होता है कि वह जो देख या सुन रहा है वह सच है, जबकि आसपास मौजूद बाकी लोगों को वैसा कोई अनुभव नहीं होता।

हैलुसिनेशन कितने प्रकार का होता है?

उनके अनुसार हैलुसिनेशन कई तरह का हो सकता है। इसका सबसे आम रूप ऑडिटरी हैलुसिनेशन है, जिसमें व्यक्ति को ऐसी आवाजें सुनाई देती हैं जो असल में कहीं होती ही नहीं। इसी प्रकार विजुअल हैलुसिनेशन में व्यक्ति को ऐसे लोग, आकृतियाँ या दृश्य नजर आते हैं, जो वहाँ वास्तव में मौजूद नहीं होते।

कई बार व्यक्ति अपने मन में पहले से बनी धारणाओं के आधार पर किसी काल्पनिक आकृति को भूत या चुड़ैल का रूप दे देता है। मसलन, सफेद साड़ी पहने किसी आकृति की कल्पना या बिना पैरों वाले भूत जैसी छवियाँ दरअसल सामाजिक मान्यताओं और कहानियों से ही दिमाग में बनती हैं।

किन मानसिक बीमारियों में होता है यह अनुभव?

आर शंकर के अनुसार हैलुसिनेशन कई मानसिक बीमारियों में देखने को मिलता है। इनमें शिजोफ्रेनिया, बाइपोलर डिसऑर्डर, पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) और गंभीर एंजायटी डिसऑर्डर शामिल हैं। इन अवस्थाओं में व्यक्ति का मस्तिष्क कुछ संकेतों को सामान्य लोगों की तुलना में अलग ढंग से ग्रहण करता है, जिसके चलते उसे ऐसी आवाजें या दृश्य महसूस हो सकते हैं जो वास्तव में होते ही नहीं।

दिमाग में दरअसल होता क्या है?

जब हम किसी व्यक्ति या वस्तु को देखते हैं, तो उस पर पड़ने वाला प्रकाश आँखों के जरिए रेटिना तक पहुँचता है। इसके बाद मस्तिष्क उस जानकारी को संसाधित कर एक तस्वीर बनाता है और हम उसे पहचान लेते हैं। लेकिन कुछ मानसिक स्थितियों में मस्तिष्क का वह हिस्सा, जो दृश्य और ध्वनि से जुड़ी जानकारी को संसाधित करता है, अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है। ऐसी हालत में बिना किसी वास्तविक दृश्य या आवाज के भी मस्तिष्क खुद ही अनुभव गढ़ लेता है। व्यक्ति को लगता है कि उसने किसी को देखा या किसी की आवाज सुनी, जबकि हकीकत में ऐसा कुछ हुआ ही नहीं होता। इसी तरह के कई उदाहरणों के जरिए इंजीनियर आर शंकर ने भूत की पूरी कहानी समझाई।

विज्ञान और अंधविश्वास के बीच का फर्क

आर शंकर का कहना है कि जिस अनुभव को बहुत से लोग भूत-प्रेत मान बैठते हैं, मनोविज्ञान उसे हैलुसिनेशन और मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति के रूप में देखता है। इसलिए अगर किसी व्यक्ति को बार-बार ऐसी आवाजें सुनाई देती हैं या ऐसी चीजें दिखती हैं जो दूसरों को नजर नहीं आतीं, तो अंधविश्वास में पड़ने के बजाय किसी मनोवैज्ञानिक से संपर्क करना ही सही समाधान हो सकता है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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