राजस्थान
एक घंटा पहले
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कोटा में जेईई एडवांस्ड की तैयारी करने वाले ज़्यादातर मेधावी छात्रों का सपना आईआईटी बॉम्बे में कंप्यूटर साइंस की सीट पाना होता है। लेकिन कोटा में पढ़े ओडिशा के जुड़वा भाई महारूफ और मसरूर ने अपनी सफलता के साथ भाईचारे की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा हर जगह हो रही है।
रैंक में अंतर के बावजूद साथ रहने का संकल्प
जेईई एडवांस्ड 2026 में महारूफ ने ऑल इंडिया रैंक 32 हासिल की, जबकि उनके जुड़वा भाई मसरूर की ऑल इंडिया रैंक 169 रही। दोनों बचपन से एक साथ पढ़ते आए हैं और हर मोड़ पर एक-दूसरे के सहयोगी बने रहे। रैंक में अंतर के कारण आगे की पढ़ाई में दोनों के अलग-अलग संस्थानों में जाने की पूरी संभावना थी। महारूफ को उनकी शानदार रैंक के दम पर आईआईटी बॉम्बे में कंप्यूटर साइंस मिलना लगभग तय था, जबकि मसरूर के लिए यह राह आसान नहीं थी।
भाई का साथ चुना, सपने को रखा एक तरफ
इसी मोड़ पर महारूफ ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने सबको भावुक कर दिया। उन्होंने आईआईटी बॉम्बे की संभावित सीट छोड़कर आईआईटी मद्रास को प्राथमिकता दी, ताकि दोनों भाई एक ही संस्थान में रहकर कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई कर सकें। महारूफ का कहना है कि उनके लिए भाई का साथ किसी भी संस्थान से कहीं अधिक मायने रखता है।
परिवार के त्याग की भी बड़ी भूमिका
दोनों भाइयों की इस कामयाबी के पीछे परिवार का बड़ा त्याग भी छिपा है। उनके पिता डॉ. मंसूर अहमद खान चिकित्सक हैं और ओडिशा में कार्यरत हैं। वहीं मां डॉ. जीनत बेगम ने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और कोटा आकर उनके साथ रहने लगीं। पिता नौकरी के चलते ओडिशा में ही रहे, जबकि मां ने बच्चों की पढ़ाई, दिनचर्या और मानसिक सहारे की पूरी ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ली।
शैक्षणिक रिकॉर्ड भी रहा शानदार
शैक्षणिक उपलब्धियों की बात करें तो महारूफ ने जेईई मेन में 44वीं रैंक हासिल की थी। साथ ही उन्होंने 10वीं बोर्ड में 95.20 प्रतिशत और 12वीं बोर्ड में 98.6 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। दूसरी ओर मसरूर ने जेईई मेन में 58वीं रैंक हासिल की और बोर्ड परीक्षाओं में भी बेहतरीन प्रदर्शन किया।
डॉक्टर माता-पिता, पर बच्चों का रुझान इंजीनियरिंग की ओर
दिलचस्प बात यह है कि दोनों भाइयों के माता-पिता डॉक्टर हैं, फिर भी इन दोनों का झुकाव शुरू से ही गणित और इंजीनियरिंग की तरफ रहा। अब दोनों भाई आईआईटी मद्रास से कंप्यूटर साइंस में बीटेक करने की तैयारी में जुटे हैं। भविष्य में उनका लक्ष्य सिविल सर्विसेज में जाना है, हालांकि वे उच्च शिक्षा के अन्य विकल्प भी खुले रखना चाहते हैं।
मेहनत के साथ रिश्तों की मजबूती की मिसाल
परिवार का कहना है कि दोनों भाइयों ने हमेशा एक-दूसरे का साथ निभाया। इस सफलता की कहानी में मेहनत के साथ-साथ रिश्तों की मजबूती भी साफ झलकती है। महारूफ और मसरूर की यह कहानी सिर्फ़ शानदार रैंक हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भरोसे, त्याग और भाईचारे की कहानी है, जहां एक भाई ने अपने सपनों से पहले अपने भाई का साथ चुना। यही वजह है कि उनकी यह कामयाबी आज हज़ारों छात्रों और परिवारों के लिए प्रेरणा बन गई है।
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