सक्सेस स्टोरी: फौज से रिटायर होकर असली फल-सब्जियों जैसी मोमबत्तियां गढ़ रहे बागेश्वर के नारायण दत्त, कमाई सुनकर चौंक जाएंगे उत्तराखंड एक घंटा पहले 2
बागेश्वर के नैनी गांव के पूर्व सैनिक नारायण दत्त फल और सब्जियों की हूबहू नकल जैसी सजावटी मोमबत्तियां बनाकर त्योहारी सीजन में हर महीने 2 से 3 लाख रुपये कमा रहे हैं और गांव की महिलाओं को रोजगार भी दे रहे हैं।

पहाड़ी इलाकों में रोजगार के सीमित मौकों की चर्चा अक्सर होती रहती है, लेकिन बागेश्वर के नैनी गांव के रहने वाले पूर्व सैनिक नारायण दत्त ने अपनी मेहनत और हुनर के दम पर स्वरोजगार की एक नई इबारत लिख दी है। सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने कुछ हटकर करने की ठानी और आज फल, सब्जियों, मक्का तथा कई आकर्षक आकृतियों वाली सजावटी मोमबत्तियां बनाकर अच्छी आमदनी कर रहे हैं।

नारायण दत्त की बनाई मोमबत्तियां देखने में बिल्कुल असली फल और सब्जियों जैसी नजर आती हैं। यही खूबी लोगों को सबसे ज्यादा लुभाती है। घर की सजावट, उपहार और त्योहारों के मौके पर इनकी मांग खासी बढ़ जाती है। स्थानीय बाजारों के साथ-साथ ये मोमबत्तियां पर्यटकों के बीच भी काफी पसंद की जाती हैं।

त्योहारी सीजन में लाखों का मुनाफा

बातचीत में नारायण दत्त ने बताया कि उन्होंने यह काम बहुत छोटे स्तर से शुरू किया था। पहले उन्होंने मोमबत्ती बनाने की तकनीक सीखी और इसके बाद नए-नए डिजाइन तैयार करने पर ध्यान दिया। आज उनकी कार्यशाला में फलों, सब्जियों, फूलों और पारंपरिक पहाड़ी उत्पादों के आकार की तरह-तरह की मोमबत्तियां बनती हैं।

डिजाइन और आकार के हिसाब से इनकी कीमत 100 रुपये से लेकर 1000 और 2000 रुपये तक रहती है। उन्होंने बताया कि दीपावली, क्रिसमस, नववर्ष और अन्य त्योहारों के दौरान बिक्री कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे सीजन में सिर्फ मोमबत्तियां बनाने और बेचने से ही वे हर महीने करीब 2 से 3 लाख रुपये तक कमा लेते हैं। उनके उत्पादों की मांग उत्तराखंड के अलग-अलग शहरों के अलावा बाहर से आने वाले सैलानियों में भी बनी रहती है।

गांव की महिलाओं के लिए प्रेरणा

नारायण दत्त का यह उद्यम केवल उनकी कमाई का साधन नहीं रह गया है, बल्कि गांव की महिलाओं के लिए रोजगार का जरिया भी बन चुका है। उन्होंने स्वयं सहायता समूह की 10 महिलाओं को अपने साथ जोड़ा है, जो मोमबत्तियां बनाने, उनमें रंग भरने, पैकिंग और सजावट के काम में हाथ बंटाती हैं। इससे इन महिलाओं को अपने ही गांव में काम मिल रहा है और उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही है।

वे अपने उत्पाद स्थानीय मेलों, प्रदर्शनियों और पर्यटन स्थल कौसानी में लगने वाले स्टॉलों के जरिए बेचते हैं। उनकी कामयाबी इस बात की मिसाल है कि अगर मेहनत, रचनात्मकता और आत्मविश्वास हो, तो गांव में रहकर भी स्वरोजगार के रास्ते अच्छी आय हासिल की जा सकती है। आज नारायण दत्त इलाके के युवाओं और महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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