राजस्थान
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विचारों
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर राजस्थान की राजधानी जयपुर से एक बेहद अनूठी और प्रेरक कहानी सामने आई है। एक ऐसे दौर में जब ज्यादातर लोग पर्यावरण संरक्षण के नाम पर सिर्फ बातें करते रह जाते हैं, वहीं जयपुर की रहने वाली 80 वर्षीय फूल कंवर बीते दो दशकों से बिना किसी सरकारी सहायता या बड़ी फंडिंग के प्रकृति को बचाने के काम में पूरी निष्ठा से जुटी हुई हैं।
उम्र के जिस पड़ाव पर अधिकांश लोग आराम करना पसंद करते हैं, उस उम्र में भी फूल कंवर हर सुबह जल्दी उठती हैं और हाथ में पानी का पात्र तथा पौधे लेकर जयपुर के अलग-अलग हिस्सों को हरा-भरा बनाने निकल पड़ती हैं। खास बात यह है कि अपने इस नेक काम के लिए उन्हें न तो किसी टीम की दरकार है और न ही बाहरी चंदे की।
पेंशन के पैसों से 19 साल की साधना
दादी फूल कंवर अपनी सरकारी पेंशन से मिलने वाली राशि को ही इस निस्वार्थ सेवा और समाजसेवा में लगाती हैं। पिछले 19 वर्षों की लगातार मेहनत और लगन के बल पर वे अब तक जयपुर में 11 हजार से अधिक पेड़-पौधे लगा चुकी हैं। उनके इस असाधारण जज्बे को देखते हुए समाज और कई संगठनों ने उन्हें कई बार सम्मानित किया है। उनका मानना है कि किसी पौधे को सिर्फ मिट्टी में रोप देना काफी नहीं है, बल्कि उसे अपने बच्चे की तरह पाल-पोसकर बड़ा करना पड़ता है।
खुद करती हैं देखरेख, लोगों को कर रहीं जागरूक
वे पौधों में केवल पानी ही नहीं डालतीं, बल्कि समय-समय पर खाद देने, उनकी छंटाई करने और ट्री-गार्ड लगाकर आवारा पशुओं से उनकी रक्षा करने का जिम्मा भी खुद ही उठाती हैं। उनका कहना है कि आजकल बहुत से लोग पर्यावरण दिवस पर सिर्फ तस्वीरें खिंचवाने के लिए पौधे लगाते हैं और बाद में उनकी सुध नहीं लेते, जिसके चलते वे पौधे बड़े होने से पहले ही सूखकर खत्म हो जाते हैं।
इसी लापरवाही को दूर करने के लिए वे अब स्थानीय लोगों और युवाओं को प्रेरित कर रही हैं कि वे पौधों को गोद लें और उनकी पूरी जिम्मेदारी निभाएं।
जून से सितंबर है पौधारोपण का सबसे उपयुक्त समय
अपने अनुभव साझा करते हुए दादी फूल कंवर बताती हैं कि वे साल में सबसे ज्यादा पौधे जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर के महीनों में लगाती हैं। उनके अनुसार यह समय पौधों के रोपण के लिए सबसे अनुकूल होता है, क्योंकि इस दौरान प्रकृति खुद पौधों के विकास में सहायक बनती है। मानसून की बारिश से पौधों को भरपूर प्राकृतिक पानी मिल जाता है, जिससे उनके जीवित रहने की संभावना शत-प्रतिशत हो जाती है।
उन्होंने जयपुर के कई नामी स्कूलों, कॉलेजों, सार्वजनिक कॉलोनियों और मोक्ष धामों (श्मशान घाटों) में हजारों पौधे रोपे हैं, जो आज विशाल वृक्ष बनकर लोगों को ऑक्सीजन दे रहे हैं।
खेल के मैदान में भी जीता राष्ट्रीय गोल्ड मेडल
दादी का सेवा भाव केवल पौधारोपण तक सीमित नहीं है। वे तपती गर्मियों में बेजुबान परिंदों के लिए दाना-पानी का इंतजाम करती हैं, कुष्ठ आश्रम में जाकर नियमित भोजन सेवा देती हैं और आवारा व घायल पशुओं के इलाज तथा टीकाकरण जैसे पुण्य कार्यों में भी हमेशा सक्रिय रहती हैं।
इसके अलावा पर्यावरण और बेहतर स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए वे दौड़ प्रतियोगिताओं यानी एथलेटिक्स में भी हिस्सा लेती हैं। उन्होंने 75 वर्ष की आयु में राज्य और राष्ट्रीय स्तर की दौड़ में हिस्सा लेकर देश के लिए गोल्ड मेडल जीते हैं। अपने इन अद्वितीय कार्यों के लिए उन्हें 'लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड' से भी सम्मानित किया जा चुका है। आज वे पूरे प्रदेश के युवाओं के लिए प्रेरणा की जीती-जागती मिसाल बन चुकी हैं।
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