झारखंड
एक घंटा पहले
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विचारों
अरहर की खेती देश के किसानों के लिए लंबे समय से फायदेमंद मानी जाती रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अरहर की दाल की मांग साल भर बनी रहती है। गांव हो या शहर, लगभग हर रसोई में अरहर की दाल पकती है। यही कारण है कि बाजार में इसके अच्छे दाम मिलते हैं और किसानों को बेहतर लाभ होता है। इसके बावजूद कई किसान आज भी पुरानी और पारंपरिक पद्धति से ही खेती करते हैं, जिससे उन्हें अपेक्षित पैदावार नहीं मिल पाती। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ जरूरी बातों पर ध्यान देकर और आधुनिक तकनीकों को अपनाकर अरहर की उपज में अच्छी बढ़ोतरी की जा सकती है।
बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त समय
देवघर के कृषि विशेषज्ञ अंबिका कुशवाहा के अनुसार जून और जुलाई का महीना दलहनी फसलों की बुवाई के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है। अरहर भी एक प्रमुख दलहनी फसल है और इसी अवधि में इसकी खेती की जाती है। उनका कहना है कि अगर किसान सही समय पर बुवाई करें तो फसल का विकास बेहतर होता है और उत्पादन भी बढ़ता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि खास तौर पर रोहिणी, आर्द्रा और मृगशिरा नक्षत्र के दौरान की गई बुवाई को बेहतर माना जाता है। इस समय मौसम और मिट्टी की नमी फसल के अनुकूल रहती है, जिससे पौधों की बढ़वार तेजी से होती है।
पुराने नहीं, उन्नत बीज चुनें
विशेषज्ञ के मुताबिक अरहर की खेती में सबसे अहम बात उन्नत किस्म के बीज का चयन है। कई बार किसान अपने पास रखे पुराने बीजों का इस्तेमाल कर लेते हैं, जिससे अंकुरण कम होता है और पौधे कमजोर रह जाते हैं। इसलिए हमेशा प्रमाणित और उन्नत किस्म के बीज ही चुनने चाहिए।
इसके साथ ही बुवाई से पहले बीज का उपचार करना भी जरूरी है। बीज उपचार से फसल को शुरुआती रोगों और कीटों से बचाव मिलता है, जिससे पौधे स्वस्थ रहते हैं और उत्पादन पर अच्छा असर पड़ता है।
पौधों के बीच दूरी का महत्व
अरहर की खेती में पौधों के बीच उचित दूरी रखना भी बेहद आवश्यक माना जाता है। बहुत घनी बुवाई करने पर पौधों को पर्याप्त धूप, हवा और पोषक तत्व नहीं मिल पाते, जिससे फसल की बढ़वार प्रभावित होती है।
अंबिका कुशवाहा का कहना है कि अगर वैज्ञानिक तरीके से कतारों और पौधों के बीच दूरी रखकर बुवाई की जाए, तो पैदावार में करीब 20 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है। इससे पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं और फसल में रोग लगने की आशंका भी घट जाती है।
ड्रिप सिंचाई से कम पानी में बेहतर उपज
सिंचाई के मामले में भी किसानों को नई तकनीक अपनाने की सलाह दी जा रही है। विशेषज्ञ बताते हैं कि बूंद-बूंद यानी ड्रिप इरिगेशन प्रणाली अरहर की खेती के लिए काफी लाभकारी साबित हो सकती है। इस तकनीक में पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है, जिससे पानी की बर्बादी कम होती है और फसल को जरूरत के मुताबिक नमी मिलती रहती है। कम पानी में अधिक उत्पादन लेने के लिए यह तरीका बेहद कारगर माना जाता है।
अंतरवर्ती खेती से अतिरिक्त आमदनी
विशेषज्ञ के अनुसार किसान अरहर के साथ कम अवधि वाली दूसरी फसलें भी उगा सकते हैं, जिसे अंतरवर्ती खेती कहा जाता है। अरहर के साथ मूंग, उड़द या अन्य उपयुक्त फसल लगाने से खेत का बेहतर उपयोग होता है और किसानों को अतिरिक्त कमाई भी मिलती है। अगर किसी कारण एक फसल से अपेक्षित लाभ न मिले, तो दूसरी फसल नुकसान की भरपाई कर देती है।
मिट्टी में बढ़ती है नाइट्रोजन की मात्रा
अरहर की खेती का एक बड़ा फायदा यह भी है कि यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करती है। दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ों में मौजूद जीवाणु मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाते हैं। इससे अगली फसलों को भी लाभ मिलता है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है।
यही वजह है कि कृषि विशेषज्ञ किसानों को फसल चक्र में अरहर को शामिल करने की सलाह देते हैं। सही बीज, सही समय और वैज्ञानिक तकनीकों के साथ की गई अरहर की खेती किसानों की आमदनी बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती है।
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