ऋषिकेश: चुनाव के वादे हुए बेअसर, जलभराव और 52 फीट ऊंचे कूड़े के पहाड़ से बेहाल शहर उत्तराखंड 2 घंटे पहले 6
ऋषिकेश में चुनावी दावों के उलट बारिश के दौरान जगह-जगह जलभराव और जर्जर सड़कों ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है, साथ ही 52 फीट ऊंचा कूड़े का ढेर प्रशासन की लापरवाही की पोल खोल रहा है।

चुनावी वादों और हकीकत का अंतर

ऋषिकेश में जब चुनाव का समय आता है, तब विकास की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। जनता से बेहतर सड़कों, जल निकासी की पुख्ता व्यवस्था और साफ-सुथरे शहर के लुभावने वादे किए जाते हैं। हालांकि, जैसे ही चुनाव बीतते हैं और धरातल पर हकीकत सामने आती है, तो ये सभी वादे खोखले नजर आते हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि शहर की जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रही है और जिम्मेदार अधिकारियों के दावे महज कागजी साबित हो रहे हैं। आज शहर का एक बड़ा हिस्सा जलभराव और बदहाल सड़कों की समस्या से घिर चुका है, जिससे आम लोगों की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित हुई है।

बारिश में जलमग्न होता शहर

ऋषिकेश में मानसून की पहली बारिश के साथ ही कई इलाकों में पानी भरने की समस्या एक आम बात हो गई है। बारिश होते ही गलियां तालाब का रूप ले लेती हैं, जिससे लोगों का अपने घरों से बाहर निकलना तक दूभर हो जाता है। यही पानी धीरे-धीरे सड़कों तक पहुंच जाता है, जिससे यातायात पूरी तरह बाधित हो जाता है। पैदल चलने वाले लोगों के अलावा, दोपहिया और चारपहिया वाहन चालकों के लिए भी यह रास्ता तय करना किसी चुनौती से कम नहीं है। ऐसी स्थिति हर साल बनती है, लेकिन जल निकासी के लिए किए गए इंतजाम नाकाफी साबित होते हैं। लोगों को पानी हटने का घंटों तक इंतजार करना पड़ता है, जिसके कारण जरूरी कार्यों में देरी होना आम हो गया है।

खस्ताहाल सड़कें और बढ़ता खतरा

जलभराव के साथ-साथ शहर की सड़कों की हालत भी बेहद चिंताजनक बनी हुई है। शहर की अधिकांश सड़कों पर बड़े-बड़े गड्ढे हो चुके हैं। बारिश के दौरान जब ये गड्ढे पानी से भर जाते हैं, तो इनका अंदाजा लगाना और भी मुश्किल हो जाता है। यह स्थिति विशेषकर दोपहिया वाहन चालकों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। स्थानीय लोगों का मानना है कि सिर्फ नई सड़कें बनाना ही समस्या का समाधान नहीं है, जब तक कि जल निकासी की उचित व्यवस्था नहीं की जाती। बारिश के पानी की सही निकासी न होने के कारण नई बनी सड़कें भी कुछ ही समय में फिर से टूट जाती हैं, जिससे सार्वजनिक धन की भारी बर्बादी भी हो रही है।

52 फीट ऊंचा कूड़े का पहाड़

शहर की सफाई व्यवस्था की बदहाली का सबसे बड़ा प्रमाण नगर के बीचों-बीच खड़ा 52 फीट ऊंचा कूड़े का पहाड़ है। यह विशाल ढेर दूर से ही शहर की खराब स्वच्छता स्थिति और कचरा निस्तारण की विफलता को बयां करता है। स्थानीय लोगों के लिए यह कूड़े का पहाड़ सिर्फ गंदगी का केंद्र नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की बदनामी और रोजमर्रा की स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का कारण भी बन गया है। कचरा प्रबंधन की लचर नीति के चलते यह समस्या लगातार विकराल होती जा रही है, जिस पर प्रशासन कोई ठोस कदम उठाने में नाकाम रहा है।

क्या कहते हैं स्थानीय निवासी

स्थानीय नागरिक उमराव सिंह ने बातचीत के दौरान बताया कि चुनाव के दौरान किए गए वादे धरातल पर पूरी तरह नहीं उतरे हैं। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ क्षेत्रों में पहले की तुलना में थोड़ा बहुत सुधार जरूर हुआ है, लेकिन उनकी राय में अभी भी कई ऐसे गंभीर मुद्दे हैं जिन पर ध्यान केंद्रित करना बहुत जरूरी है। विशेषकर बारिश के मौसम में जलभराव और सड़कों के गड्ढे लोगों के लिए एक नासूर बन चुके हैं।

एक अन्य निवासी प्रेम सिंह का कहना है कि चुनावी भाषणों में बड़े-बड़े सपने दिखाए गए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर जनता को कुछ खास नहीं मिला है। उनके मुताबिक, यदि नेताओं के वादे केवल फाइलों और मंचों तक ही सीमित रहेंगे, तो आम आदमी को इसका कोई लाभ नहीं मिलने वाला। श्याम नाम के एक अन्य निवासी ने इस बात पर जोर दिया कि अब जनता को खोखले दावों की नहीं, बल्कि ठोस और प्रभावी काम की सख्त जरूरत है। शहर की इस हालत को देखकर साफ पता चलता है कि विकास की गति और जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताएं आम जनता की जरूरतों से कोसों दूर हैं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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