छत्तीसगढ़
3 घंटे पहले
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सांप्रदायिक सौहार्द की खूबसूरत कहानी
छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में स्थित देवतराई गांव की निवासी नाजिमा खान इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई हैं। वे सरदार वल्लभभाई पटेल मैदान के सामने हर साल की तरह इस बार भी राखियों का अपना स्टॉल सजाकर बैठी हैं। हालांकि रक्षाबंधन मुख्य रूप से हिंदू समुदाय का एक पवित्र त्योहार माना जाता है, लेकिन नाजिमा खान पिछले 25 वर्षों से इस पर्व के दौरान राखियों का व्यवसाय कर रही हैं। उनका यह कार्य समाज में भाई-बहन के अटूट प्रेम और आपसी भाईचारे का एक सशक्त संदेश दे रहा है। नाजिमा का स्पष्ट मानना है कि त्योहारों की खुशियां और रिश्तों की मिठास किसी एक धर्म की सीमाओं में कैद नहीं रह सकती।
विभिन्न प्रकार की राखियों का संग्रह
नाजिमा खान के स्टॉल पर इस बार ग्राहकों के लिए राखियों की एक विस्तृत श्रृंखला मौजूद है। उनकी दुकान पर हर आयु वर्ग और पसंद के ग्राहकों को अपनी पसंद की राखी आसानी से मिल रही है। स्टॉल पर उपलब्ध प्रमुख राखियों में निम्नलिखित शामिल हैं:
- साधारण डोरा राखी
- पारंपरिक बूटी राखी
- आकर्षक फैंसी राखी
- लूंबा राखी
- एडी वाली राखी
- पूजा की राखियां
- पुराने जमाने की क्लासिक स्पंज राखी
- बच्चों के पसंदीदा कार्टून डिजाइन वाली राखियां
- रोशनी वाली लाइट राखी
- खिलौने वाली राखियां
ग्राहकों के पास अपनी पसंद और अपने बजट के अनुसार खरीदारी करने के लिए कई विकल्प मौजूद हैं।
बिक्री और ग्राहकों की पसंद
नाजिमा खान ने बातचीत में बताया कि उनके स्टॉल पर 20 रुपये से 50 रुपये तक की राखियां सबसे अधिक खरीदी जा रही हैं। उन्होंने जानकारी दी कि डोरा राखी उनके पास 50 रुपये में एक दर्जन की दर से मिल रही है। इसके अलावा बच्चों के बीच लाइट वाली राखियां काफी लोकप्रिय हैं, जो करीब 40 रुपये में बेची जा रही हैं। विभिन्न डिजाइनों और कीमतों के कारण स्थानीय ग्राहक अपने बजट के हिसाब से उत्साहपूर्वक खरीदारी कर रहे हैं। नाजिमा का कहना है कि इतने लंबे अनुभव के कारण अब उन्हें इस बात की अच्छी समझ हो गई है कि ग्राहक क्या पसंद करते हैं और बाजार की मांग क्या है।
सीजनल कारोबार और निजी आस्था
नाजिमा खान ने अपने काम के बारे में विस्तार से बताया कि वे मुख्य रूप से सीजन के दौरान ही राखियों का कारोबार करती हैं। जैसे ही रक्षाबंधन का उत्सव समाप्त होता है, वे कपड़ों की दुकान लगाने का काम शुरू कर देती हैं। उनका यह 25 साल पुराना सफर उन्हें ग्राहकों के साथ भावनात्मक रूप से भी जोड़ता है। दिलचस्प बात यह है कि नाजिमा स्वयं भी रक्षाबंधन का पर्व पूरी श्रद्धा के साथ मनाती हैं। वे अपने दो सगे भाइयों सहित कुल 8 लोगों की कलाई पर राखी बांधती हैं। उनके लिए राखी मात्र एक बिक्री का सामान नहीं है, बल्कि यह भावनाओं और भाई-बहन के अटूट रिश्ते का प्रतीक है।
समाज के लिए एक प्रेरणादायक संदेश
नाजिमा खान की यह पहल समाज के लिए एक प्रेरणा का स्रोत है। आज के दौर में जब समाज में दूरियां बढ़ाने की कोशिशें होती हैं, नाजिमा जैसी शख्सियतें साबित करती हैं कि त्योहारों की असली आत्मा प्रेम, सम्मान और भाईचारे में ही बसती है। रक्षाबंधन का रक्षा सूत्र न केवल रिश्तों को मजबूती प्रदान करता है, बल्कि यह समाज में सद्भाव और एकता की डोर को और अधिक गहरा करने का काम भी करता है। नाजिमा का यह प्रयास दर्शाता है कि मानवता किसी भी मजहबी पहचान से कहीं बड़ी है।
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