जीवनशैली
एक घंटा पहले
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एक तरफ जहां बढ़ते तापमान और तेज गर्मी ने लोगों को परेशान कर रखा है, वहीं छतरपुर जिले के ग्रामीण इलाकों में आज भी कुछ ऐसे घर हैं जहां न कूलर की जरूरत है और न ही पंखे की। इन घरों के अंदर का तापमान बाहरी वातावरण की तुलना में काफी कम रहता है, और इसकी सबसे बड़ी वजह है इनकी पुरानी और मौसम के अनुकूल बनावट।
जिले में आज भी ऐसे घर मौजूद हैं, जहां भीषण गर्मी का असर भीतर तक नहीं पहुंचता। इन घरों में रहने वालों को बिजली की भी जरूरत नहीं पड़ती और लोग बिना कूलर-पंखे के आराम से रहते हैं, क्योंकि इनकी संरचना ही ऐसी है कि गर्मी में भी अंदर ठंडक का अहसास बना रहता है।
पुराने जमाने की पारंपरिक बनावट
लवकुशनगर जनपद के अंतर्गत आने वाले हंसारी गांव के निवासी लखन द्विवेदी ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि पहले के समय में गांवों में इसी तरह के घर बनाए जाते थे, जो गर्मियों में ठंडक और सर्दियों में गर्माहट का अहसास देते थे। उस दौर में ग्रामीण अपने हाथों से ही घर तैयार करते थे और दोहरे घर बनाते थे ताकि गर्मी का असर महसूस न हो।
लखन के मुताबिक उनका घर बाबा के जमाने का है और इसे दोहरा बनाया गया है। वे बताते हैं कि पहले दोहरे खंड वाले घर ही बनाए जाते थे, क्योंकि बुंदेलखंड में गर्मी बहुत ज्यादा पड़ती है। यही कारण है कि पुराने जमाने में घरों की बनावट इसी तरह रखी जाती थी। इन घरों को अधिकतर मिट्टी और लकड़ी से तैयार किया जाता था, इनकी दीवारें मोटी रखी जाती थीं और इन्हें डबल खंड में बनाया जाता था ताकि सूरज की धूप घर के अंदर तक न पहुंच सके।
महुआ की लकड़ी के सहारे बनते थे दोहरे खंड
लखन बताते हैं कि इन घरों की दीवारें एक हाथ मोटी रखी जाती हैं। इन दीवारों में पुरानी ईंट और पत्थरों के साथ मिट्टी भरी जाती थी, ताकि गर्मी में धूप की किरणों का असर भीतर न पहुंचे। इसकी छत को महुआ की लकड़ी और चीपा से ढका जाता था और उसके ऊपर दूसरा खंड बना दिया जाता था। इस दूसरे खंड की छत को खपरैल से ढका जाता था। इसी तरह पुराने समय में घर बनाए जाते थे, ताकि बुंदेलखंड की भीषण गर्मी में भी ये ठंडे बने रहें।
1 मीटर मोटी दीवारें
लखन के अनुसार ये घर कच्चे होते थे, जिनमें मिट्टी की 1 मीटर मोटी दीवारें बनाई जाती थीं। साथ ही लकड़ियों के सहारे लेंटर डालकर इन्हें दोहरे खंड में तैयार किया जाता था। इन घरों में लगी लकड़ियां भी सालों पुरानी हैं और दरवाजे भी मोटी लकड़ी के बने होते थे।
बिजली की भी नहीं पड़ती जरूरत
लखन बताते हैं कि इन घरों में बिना बिजली के भी रहा जा सकता है, क्योंकि यहां का तापमान सामान्य रहता है। बाहर का तापमान कितना भी अधिक क्यों न हो, इन घरों में बिना कूलर या एसी के आराम से रहा जा सकता है। यहां तक कि इनमें रेफ्रिजरेटर की भी जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि सब्जियां यूं ही रखी रहती हैं और खराब नहीं होतीं।
उन्होंने बताया कि इस घर में बिजली का कनेक्शन नहीं है, क्योंकि वे यहां अकेले ही रहते हैं। दिन में वे इसी घर में रहते हैं और रात में खेत वाले घर में चले जाते हैं। परिवार के अधिकतर सदस्य अब शहरों में रहने लगे हैं।
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