बांज का पेड़: पहाड़ों का 'जल प्रहरी', जहां ये मौजूद वहां नहीं रहती पानी की किल्लत उत्तराखंड 3 महीने पहले 95
उत्तराखंड के पहाड़ों में बांज का पेड़ जल संरक्षण और पर्यावरण की रक्षा का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता है। इसकी गहरी जड़ें भूजल को बनाए रखती हैं, जिससे नौले, धारे और गधेरे आज भी जीवित हैं।

उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में बांज का पेड़ केवल एक वृक्ष भर नहीं, बल्कि पानी और पर्यावरण की सुरक्षा का सबसे बड़ा रखवाला माना जाता है। जहां-जहां इन पेड़ों की मौजूदगी है, वहां जल स्रोत आज भी समृद्ध बने हुए हैं और लोगों को पानी की कमी का सामना नहीं करना पड़ता।

भूजल का असली रखवाला

पर्यावरणविद् किशन मलड़ा के अनुसार, बांज की जड़ें इतनी गहरी और मजबूत होती हैं कि वे बारिश के पानी को जमीन के भीतर तक पहुंचा देती हैं। इसी प्रक्रिया से भूजल स्तर बना रहता है और पहाड़ों के पारंपरिक जल स्रोत वर्षों तक सूखते नहीं।

नौले, धारे और गधेरों की जान

यही वजह है कि पहाड़ी क्षेत्रों के पारंपरिक नौले, धारे और गधेरे आज भी जीवित और प्रवाहमान हैं। बांज के जंगल इन प्राकृतिक स्रोतों को लगातार रिचार्ज करते रहते हैं, जिससे गांवों की पानी की जरूरतें पूरी होती हैं।

प्राकृतिक एयर कंडीशनर

बांज के घने जंगल किसी प्राकृतिक एयर कंडीशनर की तरह काम करते हैं। ये आसपास के तापमान को नियंत्रित रखते हैं और गर्मी के असर को कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

मिट्टी को उपजाऊ बनाने में मदद

इस पेड़ की पत्तियां जब झड़कर सड़ती हैं तो मिट्टी को पोषक ह्यूमस मिलता है। यह ह्यूमस जमीन को उपजाऊ बनाता है, जिससे जंगल और आसपास की वनस्पति को नई ऊर्जा मिलती है।

जलवायु संकट में बहुमूल्य

बढ़ते जलवायु परिवर्तन और गहराते जल संकट के दौर में बांज का पेड़ बेहद बहुमूल्य साबित हो रहा है। पानी को सहेजने, तापमान को संतुलित रखने और मिट्टी की सेहत बनाए रखने जैसी इसकी खूबियां इसे पहाड़ों के पर्यावरण की रीढ़ बनाती हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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