उत्तर प्रदेश
एक घंटा पहले
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जून का महीना ड्रैगन फ्रूट उगाने वाले किसानों के लिए सबसे संवेदनशील समय माना जाता है। इस दौरान खेतों में बढ़ती नमी और चढ़ता तापमान फंगस जनित रोगों को पनपने का अनुकूल माहौल दे देता है, जिससे फसल को भारी क्षति पहुंच सकती है। थोड़ी-सी लापरवाही पूरी मेहनत पर पानी फेर सकती है।
लखीमपुर खीरी में बढ़ता रुझान
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में किसान ड्रैगन फ्रूट की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। बाजार में इस फल की लगातार बनी रहने वाली मांग के चलते किसानों को अच्छी कमाई होती है, यही वजह है कि धीरे-धीरे इसका रकबा बढ़ता जा रहा है। खेती को प्रोत्साहित करने के लिए विभाग की ओर से किसानों को अनुदान भी दिया जाता है, ताकि वे आसानी से सहायता पाकर इस फसल की ओर रुख कर सकें। हालांकि जून के महीने में कीटों का प्रकोप भी बढ़ जाता है और जरा-सी असावधानी फल को पूरी तरह बर्बाद कर सकती है।
नमी और तापमान बढ़ाते हैं जोखिम
जून में खेतों में नमी और तापमान दोनों बढ़ने के कारण फफूंद से होने वाले रोग तेजी से फैलते हैं और ड्रैगन फ्रूट की फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। यदि किसान समय रहते सतर्कता नहीं बरतते, तो पौधे सड़ने लगते हैं, तनों पर दाग उभर आते हैं और फल का उत्पादन भी प्रभावित हो जाता है, जिसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ता है।
कम पानी में अधिक मुनाफा, पर बरसात से पहले चुनौती
पिछले कुछ वर्षों में ड्रैगन फ्रूट की खेती किसानों के बीच खूब लोकप्रिय हुई है। कम पानी में अधिक मुनाफा देने वाली इस फसल ने कई किसानों की आर्थिक हालत मजबूत की है, लेकिन बरसात से ठीक पहले का मौसम इसके लिए बड़ी चुनौती बनकर आता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, जून में हल्की बारिश और अधिक नमी से फफूंद तेजी से सक्रिय हो जाती है, और यदि पौधों की सही देखभाल न हो तो पूरा बाग संक्रमित हो सकता है।
कौन-कौन सी बीमारियां करती हैं हमला
जून के दौरान ड्रैगन फ्रूट में मुख्य रूप से स्टेम रॉट, एन्थ्रेक्नोज, ब्राउन स्पॉट और सॉफ्ट रॉट जैसी बीमारियां सामने आती हैं। इन रोगों में पौधों की शाखाओं पर काले या भूरे धब्बे बनने लगते हैं और धीरे-धीरे वह हिस्सा गलने लगता है, जिससे पूरी शाखा खराब हो सकती है। कई बार संक्रमण पौधे की जड़ तक पहुंच जाता है, जिससे पूरा पौधा सूख जाता है।
जल भराव बन जाता है बड़ी वजह
अक्सर किसान जून में सिंचाई करते समय खेतों में जल भराव कर देते हैं, जिससे लगातार नमी बनी रहती है। यदि खेत में पानी रुकता है या पौधों के बीच पर्याप्त दूरी नहीं रहती, तो फंगस तेजी से फैलता है और निरंतर नमी रहने पर रोग का असर और बढ़ जाता है। यही कारण है कि इस महीने खेत की साफ-सफाई और बेहतर जल निकासी पर खास ध्यान देना बेहद जरूरी हो जाता है।
शुरुआती संकेत पहचानना अहम
ड्रैगन फ्रूट के पौधों में फंगस लगने के शुरुआती लक्षण आसानी से दिखाई दे जाते हैं। यदि शाखाओं पर छोटे भूरे धब्बे नजर आएं, तने नरम पड़ने लगें या कहीं से पानी जैसा रिसाव दिखे, तो समझ लेना चाहिए कि फंगस सक्रिय हो चुका है। कई बार संक्रमित हिस्से पर सफेद या काले रंग की परत भी बन जाती है। फल पर गोल धब्बे पड़ना, फल का समय से पहले सड़ना और पौधे की बढ़वार रुक जाना भी संक्रमण के संकेत माने जाते हैं। शुरुआती अवस्था में पहचान कर लेने पर बीमारी को फैलने से रोका जा सकता है।
फफूंदनाशक छिड़काव से नियंत्रण
फंगस पर काबू पाने के लिए फफूंदनाशक दवाओं का छिड़काव बेहद जरूरी है। किसान कॉपर ऑक्सीक्लोराइड को 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव कर सकते हैं। इसके अलावा कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी या मैनकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करना भी लाभकारी माना जाता है।
विशेषज्ञ की सलाह
प्रभारी जिला उद्यान अधिकारी लखीमपुर मृत्युंजय सिंह ने बताया कि यदि फंगस का रोग अधिक दिखाई दे, तो तुरंत कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करना चाहिए। किसान मेटालेक्सिल और मैनकोजेब मिश्रित दवा का उपयोग कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि दवा का छिड़काव सुबह या शाम के समय करना अधिक फायदेमंद रहता है, क्योंकि तेज धूप में स्प्रे करने से दवा का असर कम हो सकता है।
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