छत्तीसगढ़
एक घंटा पहले
3
विचारों
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण इलाके में एक ऐसी जगह मौजूद है, जहां रोजाना सुबह और खासकर शाम के समय कौवे बड़ी संख्या में खेतों में आते हैं। इस स्थान को लोग 'कौवा डांड' के नाम से जानते हैं। नाम सुनते ही यहां आने वाला हर व्यक्ति चौंक जाता है और इसके पीछे छिपी पूरी कहानी जानना चाहता है।
1962 में तिब्बती समुदाय ने रखा था नाम
सन 1962 में जब तिब्बती समाज इस इलाके में आकर बसा, उस समय यहां सिर्फ कौवे ही नजर आते थे। उनकी मधुर आवाज लोगों को बेहद पसंद आती थी। तभी किसी व्यक्ति ने इस जगह का नाम 'कौवा डांड' रख दिया। तब से लेकर आज तक रोपाकार के तिब्बती कैंप-2 को लोग इसी नाम से पहचानते हैं।
कौवों की भरमार बनी नामकरण का आधार
स्थानीय निवासी नीरज श्रीवास्तव ने बताया कि बचपन से बुजुर्गों से मिली जानकारी के अनुसार, वर्ष 1962 में तिब्बती शरणार्थियों के आगमन के समय यह पूरा क्षेत्र घने जंगलों से ढका हुआ था। उस दौर में यहां कौवों की तादाद इतनी ज्यादा थी कि पूरे इलाके की पहचान ही कौवों से जुड़ गई। इसी वजह से इस स्थान को 'कौआ डांड' नाम दिया गया।
आज भी गूंजती रहती है कौवों की आवाज
नीरज श्रीवास्तव के मुताबिक, मौजूदा समय में भी कौआ डांड में कौवों की संख्या दूसरी जगहों के मुकाबले काफी अधिक है। सुबह और शाम के वक्त चारों ओर कौवों की आवाज सुनाई देती रहती है। कैंप नंबर-2 क्षेत्र में सबसे ज्यादा कौवे देखे जा सकते हैं, जिससे यह स्थान आज भी अपने नाम को सार्थक करता है।
जहां आज शहरों और गांवों में कौवा पक्षी विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गया है, वहीं कौवा डांड में आज भी सैकड़ों की संख्या में कौवे मौजूद हैं, जो शाम के समय अपनी कोयल जैसी आवाज से लोगों को सुकून देते हैं।
पर्यटकों के लिए बना आकर्षण का केंद्र
नीरज ने बताया कि देश के कई हिस्सों में कौवों की संख्या लगातार घटती जा रही है, लेकिन मैनपाट के कौआ डांड में आज भी बड़ी तादाद में कौवे देखे जा सकते हैं। यही वजह है कि यहां पहुंचने वाले पर्यटक इस अनूठे नजारे को देखकर हैरान रह जाते हैं और कौवों की इस बड़ी आबादी को निहारने के लिए विशेष रूप से इस स्थान का रुख करते हैं।
Comments
0 comment