बिहार
एक घंटा पहले
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बिहार देश के उन राज्यों में गिना जाता है, जहां मछली पालने वालों की कोई कमी नहीं है। यहां किसान न केवल आम बल्कि कई अनोखी और दुर्लभ किस्म की मछलियां भी पालते हैं। बेहतर मुनाफे के लिए राज्य के मत्स्य पालक रोहू, ग्रास, कतला और कमलकार जैसी मछलियों का खूब पालन करते हैं। हालांकि इन प्रजातियों के पालन में खास सावधानी बरतनी पड़ती है और समय-समय पर दाना-पानी पर अच्छी-खासी रकम भी खर्च होती है। लेकिन एक ऐसी मछली भी है, जिसकी खूबियां जानकर हर कोई हैरान रह जाता है।
इस खास मछली का नाम तेलापिया है। फिलहाल यह बिहार में उतनी प्रचलित नहीं हुई है, मगर पूर्वी चंपारण जिले के संग्रामपुर स्थित बरियारिया गांव में इसका पालन शुरू हो चुका है।
कौन कर रहा है तेलापिया का पालन
इस मछली का पालन करने वाले मुकेश भगत संग्रामपुर के सबसे बड़े मत्स्य पालकों में से एक नंदलाल भगत के बेटे हैं। मुकेश बताते हैं कि वे इस मछली को बंगाल से लेकर आए हैं और उनकी जानकारी के मुताबिक उनके इलाके में और कोई मत्स्य पालक इस खास मछली का पालन नहीं करता।
पालन में आसानी, नहीं पड़ती हेचरी की जरूरत
मुकेश के अनुसार, तेलापिया का पालन बेहद आसान है, क्योंकि यह लगातार खुद ही प्रजनन करती रहती है और इसके छोटे बच्चों को हेचरी से लाने की कोई जरूरत नहीं पड़ती। वे बताते हैं कि अपने तालाबों में वे रोहू, ग्रास, कतला और कमलकार जैसी मछलियां भी पालते हैं, लेकिन इनके लिए हर साल हेचरी से बेहद छोटी मछलियां लाकर तालाब में डालनी पड़ती हैं। तेलापिया के मामले में ऐसा नहीं है—एक बार तालाब में छोड़ने के बाद दोबारा हेचरी जाने की आवश्यकता नहीं रहती।
यह मछली अपनी संख्या लगातार बढ़ाती रहती है और कभी खत्म नहीं होती। जानकारी के अनुसार, यह तालाब की झाड़ियों में रहना और पानी का कीचड़ खाना पसंद करती है। मुकेश का कहना है कि इसके पालन में कोई अतिरिक्त खर्च नहीं आता और यह अपना पालन-पोषण खुद ही कर लेती है।
बाजार में कितनी है कीमत
मुकेश भगत के मुताबिक, चंपारण में तेलापिया की थोक बिक्री 130 रुपए प्रति किलो की दर से होती है, जबकि बाजार में यह 150 रुपए प्रति किलो के भाव से मिलती है। चूंकि बिहार में इसका पालन हाल ही में शुरू हुआ है, इसलिए फिलहाल यह बाजार में कम ही दिखाई देती है।
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