उपनाम: सरगुजा
60 साल की उम्र में मिट्टी के चूल्हे पर जलेबी बनाकर मिसाल बनीं सबंदो बाई, संघर्ष से बदल दी जिंदगी
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में 60 वर्षीय सबंदो बाई मिट्टी के चूल्हे पर देसी जलेबी बनाकर सम्मान की आजीविका कमा रही हैं। कभी मजदूरी करके दो वक्त की रोटी के लिए जूझने वाली अम्मा अब अपनी मेहनत के दम पर आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।
धान की कटाई के बाद आलू की खेती से मालामाल हो रहे किसान, जानें बंपर पैदावार का सीक्रेट
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में किसान पारंपरिक तरीकों को अपनाकर आलू की खेती से लाखों का मुनाफा कमा रहे हैं। ठंड के मौसम में आलू की बंपर पैदावार पाने और फसल को खराब होने से बचाने के गुर यहां जानें।
अंबिकापुर: जंगलों के कटने और जहरीले रसायनों की मार, गांवों से गायब हो रहे हैं कौवे
छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में कौवों की आबादी में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे स्थानीय लोग और पर्यावरण प्रेमी चिंतित हैं। विशेषज्ञ पेड़ों की कटाई और खेती में कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग को इसका बड़ा कारण मान रहे हैं।
जंगल की देन शारू सुकटी: छत्तीसगढ़ के सरगुजा की पुरानी परंपरा, टमाटर और पसिया से खिलता है स्वाद
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में आदिवासी समाज आज भी जंगल से मिलने वाले शारू का सेवन करते हैं, जिसे सुखाकर सुकटी बनाई जाती है और सदियों से इसे पारंपरिक तरीके से पकाकर खाया जा रहा है।
पितृ पक्ष में गायब हो रहे कौवे: अंबिकापुर में पक्षियों की घटती आबादी से बढ़ी चिंता, जानिए इसके बड़े कारण
छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में कौवों की संख्या में आई भारी कमी से लोग चिंतित हैं। पितृ पक्ष के दौरान कौवों के दर्शन दुर्लभ होने के पीछे पर्यावरण में आए बदलाव और मानवीय हस्तक्षेप को मुख्य जिम्मेदार माना जा रहा है।
सरगुजा के जंगलों का खास स्वाद: शारू सुकटी की दीवानगी, पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है परंपरा
छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में आदिवासी समुदाय जंगल से मिलने वाली शारू सुकटी का सेवन पारंपरिक तरीके से करते हैं। इसे सुखाकर और पीसकर लंबे समय तक संरक्षित रखा जाता है, जो आज भी ग्रामीण थाली का अभिन्न अंग है।
कर्मा पूजा: भादो एकादशी पर आदिवासी परंपरा और प्रकृति के प्रति अटूट आस्था की अनूठी झलक
सरगुजा क्षेत्र में भादो एकादशी के मौके पर कर्मा पूजा का पर्व पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है, जिसमें युवतियां परिवार की सुख-समृद्धि के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।
सरगुजा: शादी के 4 महीने बाद ही उजड़ गई खुशियां, नवविवाहिता ने खाया जहर, पिता ने लगाए संगीन आरोप
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में एक नवविवाहिता ने शादी के महज 4 महीने के भीतर जहर खाकर अपनी जान दे दी, जिसके बाद मायके पक्ष ने ससुराल वालों पर प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए हैं।
आत्मनिर्भरता की मिसाल: छत्तीसगढ़ के मैनपाट में भुट्टे बेचकर बालरीकिम ने बदली अपनी जिंदगी
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में एक व्यक्ति ने देसी जुगाड़ और कड़ी मेहनत के दम पर भुट्टे के कारोबार को सफलता की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।
धान की खेती: कल्ले फूटने के दौरान इन बातों का रखें खास ख्याल, फसल की पैदावार में होगा इजाफा
सितंबर का महीना धान की फसल के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दौरान पौधों में कल्ले विकसित होते हैं। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को बेहतर उत्पादन के लिए पोटाश और संतुलित खाद के सही इस्तेमाल की सलाह दी है।
पीएम मोदी के टैलेंट सर्च अभियान पर बोले अंबिकापुर के कोच- अब बस्ती के बच्चे भी लाएंगे देश के लिए मेडल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशभर में शुरू किए जा रहे टैलेंट सर्च अभियान का अंबिकापुर के कोच ने स्वागत किया है। उनका मानना है कि इस पहल से स्लम और ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को आगे बढ़ने का बड़ा अवसर मिलेगा।
बरसात में जंगलों से चुनकर लाते हैं ये खास पत्ता, चावल के माड़ के साथ बनती है लाजवाब सब्जी
छत्तीसगढ़ के सरगुजा में ग्रामीण बरसात के दौरान जंगलों से कोचई पत्ते लाते हैं और उसे सुखाकर चावल के माड़ के साथ एक खास पारंपरिक डिश तैयार करते हैं। यह तरीका उन्हें बाजार पर निर्भर रहने से बचाता है और स्वाद में भी लाजवाब है।
सरगुजा: मेझरी की पारंपरिक खेती का जलवा बरकरार, कम खर्च में मिलता है बंपर मुनाफा
छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में किसान आज भी अपनी पुरानी विरासत मेझरी की खेती को संजोए हुए हैं, जो कम मेहनत और न्यूनतम लागत में अच्छी पैदावार देती है।
राजघराने की खेती: सरगुजा के विंधेश्वर शरण सिंहदेव ने जैविक पद्धति से बदला कृषि का स्वरूप
सरगुजा राजपरिवार के सदस्य विंधेश्वर शरण सिंहदेव ने अपनी 40 एकड़ जमीन पर जैविक खेती का सफल मॉडल पेश किया है, जिससे अब जीराफूल चावल की मांग दिल्ली जैसे बड़े शहरों तक बढ़ गई है।
गाय और भैंस के दूध में क्या है फर्क, एक्सपर्ट ने पाचन, फैट और उपयोगिता को लेकर दी पूरी जानकारी
पशुपालन के जानकारों के अनुसार गाय और भैंस का दूध अपने गुणों में काफी अलग होते हैं, जहाँ गाय का दूध हल्का और सुपाच्य माना जाता है, वहीं भैंस के दूध का उपयोग फैट की अधिकता के कारण दुग्ध उत्पादों के लिए बेहतर होता है।