ईरान-इजरायल युद्ध की मार: पानी की लाइन डलवाना भी हुआ महंगा, पाइप-फिटिंग से लेकर मजदूरी तक के दाम चढ़े मध्य प्रदेश एक घंटा पहले 2
ईरान-इजरायल युद्ध का असर अब आम लोगों की जेब पर साफ नजर आने लगा है। प्लंबिंग में काम आने वाले पाइप, नल, वॉल्व और एचडीपीई सामग्री के दाम 25 से 40 फीसदी तक बढ़ गए हैं, जिससे घर बनवाने वालों से लेकर सरकारी ठेकेदारों तक हर कोई परेशान है।

ईरान-इजरायल के बीच चल रहे युद्ध का प्रभाव अब केवल अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह आम आदमी की रोजमर्रा की जरूरतों पर भी दिखने लगा है। मकान बनवा रहे परिवारों से लेकर सरकारी जल योजनाओं पर काम कर रहे ठेकेदारों तक, हर कोई बढ़ती लागत से जूझ रहा है। खासकर पानी की आपूर्ति से जुड़े कामों में इस्तेमाल होने वाले पाइप, फिटिंग, नल, वॉल्व और दूसरी सामग्रियों के दाम लगातार ऊपर जा रहे हैं।

इसका सीधा प्रभाव नए घरों की प्लंबिंग, कॉलोनियों में पानी की लाइन बिछाने और सरकारी जल परियोजनाओं की लागत पर पड़ रहा है। हालत यह है कि कुछ महीने पहले जिस काम का खर्च एक अनुमान के आधार पर तय किया गया था, वही अब 25 से 30 फीसदी तक महंगा हो चुका है।

पाइप के दामों में 25 से 40 फीसदी की उछाल

प्लंबिंग में इस्तेमाल होने वाले पीवीसी, सीपीवीसी और एचडीपीई पाइपों की कीमतों में बीते कुछ महीनों के दौरान 25 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। जानकारों का कहना है कि पीवीसी और दूसरे प्लास्टिक उत्पाद सीधे तौर पर कच्चे तेल से जुड़े होते हैं। युद्ध और वैश्विक मांग के प्रभावित होने से कच्चे माल की उपलब्धता घटी है, जिसके चलते पाइप बनाने की लागत बढ़ गई है। इसके अलावा पाइप फिटिंग में काम आने वाले कई सामान भी पहले की तुलना में काफी महंगे हो गए हैं।

नल, वॉल्व और ब्रास उत्पाद भी महंगे

बाथरूम और किचन में लगने वाले फैंसी नल, मिक्सर, डाइवर्टर और अन्य ब्रास आधारित उत्पादों के दाम भी 25 से 30 प्रतिशत तक चढ़ गए हैं। इन उत्पादों के निर्माण में पीतल यानी ब्रास का इस्तेमाल होता है, जिसका कच्चा माल बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर रहता है। वैश्विक स्तर पर आपूर्ति बाधित होने से ब्रास उत्पादों की लागत निरंतर बढ़ रही है। इसी कारण पानी के बहाव को नियंत्रित करने वाले बड़े वॉल्व और गेट वॉल्व भी पहले की अपेक्षा महंगे हो गए हैं।

ट्रांसपोर्ट और ईंधन ने बढ़ाई मुश्किल

केवल कच्चे माल की कीमतें ही नहीं बढ़ी हैं, बल्कि माल ढुलाई का खर्च भी तेजी से ऊपर गया है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री भाड़े और घरेलू स्तर पर डीजल-पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर परिवहन पर पड़ा है। फैक्ट्रियों से दुकानों और प्रोजेक्ट साइट तक सामान पहुंचाने की लागत बढ़ने से उत्पादों की अंतिम कीमत भी बढ़ गई है, जिसका बोझ सीधे ग्राहकों और ठेकेदारों पर आ रहा है।

मजदूरी में बढ़ोतरी, निर्माण लागत पर दोहरी मार

पीएचई वॉटर सप्लाई, रेलवे और पीडब्ल्यूडी की परियोजनाओं में काम कर रहे सरकारी ठेकेदार सुनील द्विवेदी बताते हैं कि फरवरी से ही बाजार में दाम बढ़ने का माहौल बनने लगा था और मार्च से लगातार रेट चढ़ते गए। साथ ही मजदूरों की मजदूरी में भी अच्छी-खासी वृद्धि हुई है।

उनके अनुसार, पहले जहां मजदूर 500 रुपये प्रतिदिन में काम कर लेते थे, वहीं अब 700 रुपये तक दिहाड़ी मांग रहे हैं। इसका साफ अर्थ है कि बढ़ते परिवहन, भोजन और रहने के खर्च का असर मजदूरी की दरों पर भी पड़ा है।

सरकारी परियोजनाओं पर बढ़ा दबाव

बस्तियों और मुख्य सड़कों के नीचे बिछाए जाने वाले डीआई और एचडीपीई पाइपों की लागत बढ़ने से सरकारी जल योजनाएं भी प्रभावित हो रही हैं। बड़ी पानी की टंकियों के निर्माण में काम आने वाले स्टील और सीमेंट की कीमतों में भी इजाफा दर्ज हुआ है। सरकारी टेंडर पहले से तय फिक्स्ड रेट पर स्वीकृत होते हैं और महंगाई बढ़ने के बाद भी इसमें अतिरिक्त भुगतान का प्रावधान नहीं रहता। इसी वजह से ठेकेदारों के लिए पुराने रेट पर काम पूरा करना कठिन हो रहा है।

अतिरिक्त बजट की मांग और धीमी होती रफ्तार

बढ़ती लागत के चलते कई ठेकेदारों की कार्यशील पूंजी पर दबाव बढ़ गया है। कुछ जगहों पर काम की गति धीमी पड़ गई है, जबकि कई ठेकेदार तय समय सीमा में काम पूरा नहीं कर पाए और ठेका किसी और को सौंप दिया गया। वहीं खुदाई करने वाली मशीनों, जेसीबी, पोकलेन और जेनरेटर को चलाने में लगने वाले डीजल की बढ़ी कीमतों ने ऑपरेशनल खर्च में 15 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर दी है।

ऐसे में विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर वैश्विक तनाव जल्द सामान्य नहीं हुआ, तो आने वाले समय में जल आपूर्ति और निर्माण कार्यों की लागत में और वृद्धि देखने को मिल सकती है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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