सरगुजा के जंगलों का खास स्वाद: शारू सुकटी की दीवानगी, पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है परंपरा जीवनशैली 3 घंटे पहले 2
छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में आदिवासी समुदाय जंगल से मिलने वाली शारू सुकटी का सेवन पारंपरिक तरीके से करते हैं। इसे सुखाकर और पीसकर लंबे समय तक संरक्षित रखा जाता है, जो आज भी ग्रामीण थाली का अभिन्न अंग है।

जंगलों से जुड़ा आदिवासी खानपान

छत्तीसगढ़ का सरगुजा जिला अपनी समृद्ध आदिवासी संस्कृति और घने जंगलों के लिए पहचाना जाता है। यहाँ के निवासियों के लिए जंगल केवल जीविका का जरिया नहीं हैं, बल्कि यह उनकी खानपान की आदतों का मुख्य आधार भी हैं। प्रकृति की गोद में उगने वाली शारू सुकटी इसी परंपरा का एक अहम हिस्सा है। ग्रामीण बड़ी मेहनत से जंगल से शारू इकट्ठा करते हैं और उसे विशेष प्रक्रिया के जरिए सुरक्षित रखते हैं ताकि साल भर इसका आनंद लिया जा सके।

तैयार करने की पारंपरिक विधि

स्थानीय निवासी रामनाथ किंडो के अनुसार, शारू का उपयोग करने का तरीका बेहद पारंपरिक है। जंगल से लाए गए शारू को पहले अच्छी तरह से साफ किया जाता है और उसके बाद तेज धूप में सुखाया जाता है। पूरी तरह सूख जाने के बाद, ग्रामीण इसे पीसकर पाउडर या गुड़ा के रूप में तैयार कर लेते हैं। इस सूखे हुए पाउडर को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। जब भी जरूरत महसूस होती है, ग्रामीण इसे निकालकर स्वादिष्ट सब्जी तैयार करते हैं। यह प्रक्रिया उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है और आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है।

स्वाद का अनूठा मेल

शारू सुकटी को पकाने का अपना एक अलग अंदाज है। ग्रामीण महिला सुखमनी बताती हैं कि सबसे पहले कड़ाही में तेल गरम करके उसमें लहसुन और मिर्च का तड़का लगाया जाता है। इसके बाद इसमें टमाटर का उपयोग किया जाता है। यदि कभी टमाटर उपलब्ध न हो, तो ग्रामीण सब्जी में चावल के पसिया का इस्तेमाल करते हैं। पसिया न केवल सब्जी को एक गाढ़ा और बेहतरीन टेक्सचर देता है, बल्कि इसके स्वाद में भी कई गुना इजाफा कर देता है। गर्मी के मौसम में भी, जब ताजी सब्जियां कम उपलब्ध होती हैं, तब ये सुखाकर रखी गई शारू सुकटी ही ग्रामीणों की थाली का मुख्य आकर्षण होती है।

पीढ़ियों से कायम है पहचान

सरगुजा के आसपास के ग्रामीण इलाकों में हर आयु वर्ग के लोग इस व्यंजन को बखूबी जानते हैं। यह सिर्फ एक सब्जी नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच रही है। रामनाथ किंडो का कहना है कि लोग मौसम के अनुसार अपनी पसंद से इसका सेवन करते हैं। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब जब बाहरी शहरों से लोग सरगुजा की यात्रा पर आते हैं, तो वे इस पारंपरिक शारू सुकटी के बारे में उत्सुकता दिखाते हैं। कई सैलानी तो इसे चखने के बाद इसकी सराहना भी करते हैं और इसके अनोखे स्वाद के दीवाने हो जाते हैं। आज के आधुनिक दौर में भी यह पारंपरिक साग ग्रामीण इलाकों में अपनी साख और उपयोगिता बनाए हुए है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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