85 साल पुरानी लखीमपुर खीरी की वो मिठाई, जिसके मुरीद थे मुलायम सिंह यादव जीवनशैली एक घंटा पहले 3
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में मैगलगंज के मशहूर रसगुल्ले का स्वाद बरसों से लोगों को अपनी ओर खींच रहा है। इस खास मिठाई की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव भी इसके स्वाद के दीवाने थे।

मैगलगंज की पहचान बना खास रसगुल्ला

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में स्थित मैगलगंज कस्बा अपनी एक विशेष उपलब्धि के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध है। यहाँ मिलने वाले रसगुल्ले न केवल स्थानीय निवासियों की पहली पसंद हैं, बल्कि आसपास के जिलों से आने वाले यात्री भी यहां का स्वाद चखे बिना आगे नहीं बढ़ते। समय के साथ मैगलगंज के इन रसगुल्लों ने अपनी एक अलग पहचान और प्रतिष्ठा बना ली है। यहाँ की मिठाई की दुकानों पर दिनभर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती है, खासकर त्योहारों और विवाह के सीजन में इन रसगुल्लों की मांग कई गुना तक बढ़ जाती है।

85 साल पुराना है इतिहास

इस मिठाई का इतिहास करीब 85 साल पुराना बताया जाता है। इन रसगुल्लों की शुरुआत का श्रेय श्यामलाल हलवाई को जाता है, जिन्होंने वर्ष 1941 में पहली बार मैगलगंज में अपनी दुकान खोलकर इस विशेष रेसिपी को लोगों के सामने पेश किया था। तब से लेकर आज तक, इन रसगुल्लों का स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। समय बीतने के साथ दुकान की साख बढ़ती गई और आज स्थिति यह है कि मैगलगंज के इन रसगुल्लों की मांग राज्य की राजधानी लखनऊ तक रहती है।

मुलायम सिंह यादव को थी बेहद पसंद

इस रसगुल्ले के दीवानों में कई बड़े नाम शामिल रहे हैं, जिनमें समाजवादी पार्टी के नेता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव का नाम प्रमुख है। उनके करीबी और स्थानीय लोग बताते हैं कि मुलायम सिंह यादव जब भी शाहजहांपुर या बरेली की ओर यात्रा करते थे, तो मैगलगंज से गुजरते समय इन रसगुल्लों का स्वाद लेना नहीं भूलते थे। उनका इस मिठाई के प्रति लगाव ही था जिसने इसे एक अलग पहचान दिलाई। आज भी कई लोग इन रसगुल्लों को बड़े चाव से खरीदते हैं और अपने साथ ले जाना पसंद करते हैं।

मुंह में घुल जाने वाला स्वाद

मैगलगंज के रसगुल्ले की सबसे बड़ी खासियत इसका बेहद मुलायम होना है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह रसगुल्ला मुंह में रखते ही घुल जाता है। यही कारण है कि इसे एक बार खाने वाला व्यक्ति इसका स्वाद कभी भूल नहीं पाता। दुकानदारों के अनुसार, इसे बनाने का पारंपरिक तरीका ही इसकी सफलता का राज है।

क्या है कीमत और बनाने का तरीका

वर्तमान में इस पुरानी विरासत को आगे बढ़ा रहे नितिन का कहना है कि उनकी दुकान, जिसे धनपाल मिष्ठान के नाम से जाना जाता है, 1941 से चली आ रही है। इस समय यहां रसगुल्ला 360 रुपए प्रति किलो की दर से बेचा जा रहा है। नितिन बताते हैं कि इन रसगुल्लों को तैयार करने में मुख्य रूप से खोया का उपयोग किया जाता है। इनकी शुद्धता और स्वाद को बरकरार रखने के लिए आज भी इन्हें मिट्टी की हांडी में पैक करके ग्राहकों को दिया जाता है, जो इनकी पारंपरिक शैली की पहचान है।

चेतन तिवारी पाबना के उत्तर प्रदेश संवाददाता हैं और राज्य की राजनीति, प्रशासन तथा जमीनी मुद्दों को कवर करते हैं। लखनऊ में रहते हुए वे जिलों से लेकर विधानसभा तक की खबरें संतुलित रिपोर्टिंग के साथ पाठकों तक पहुंचाते हैं। आम लोगों के मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर उनका खास फोकस रहता है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप