राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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जांच जारी रखने के पीछे का सच
जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में एक बड़ा सवाल यह उठ रहा था कि आखिर उनके इस्तीफे के बाद भी जांच प्रक्रिया को क्यों नहीं रोका गया। हाल ही में सामने आई 126 पन्नों की जांच समिति की रिपोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम पर से पर्दा उठा दिया है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के लगभग 20 दिन बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने समिति को निर्देश दिया था कि वे अपनी जांच को तार्किक अंजाम तक पहुंचाएं।
लोकसभा सचिवालय का निर्देश और कानून
समिति की रिपोर्ट में 29 अप्रैल को लोकसभा सचिवालय द्वारा भेजे गए एक महत्वपूर्ण पत्र का जिक्र किया गया है। इस पत्र के माध्यम से यह संदेश दिया गया था कि लोकसभा अध्यक्ष चाहते हैं कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 4(2) के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रिया को पूरी तरह से निष्पादित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली इस समिति ने यह माना कि जस्टिस वर्मा का 9 अप्रैल को इस्तीफा देना और जांच से अलग होने का फैसला, वैधानिक जांच के स्वतः खत्म होने का आधार नहीं बन सकता है। समिति इस निष्कर्ष पर पहले ही 21 अप्रैल को पहुंच चुकी थी कि कार्यवाही से नाम वापस लेने के बावजूद प्रक्रिया जारी रहेगी।
जांच के दौरान पूरी हुई प्रक्रियाएं
रिपोर्ट के अनुसार, जब जस्टिस वर्मा ने खुद को कार्यवाही से अलग किया, तब तक जांच अपने अंतिम चरणों में थी। इस बिंदु तक निम्नलिखित कानूनी प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी थीं:
- जस्टिस वर्मा के खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय किए जा चुके थे।
- बचाव पक्ष के बयान और अतिरिक्त बयान आधिकारिक रूप से रिकॉर्ड का हिस्सा बन चुके थे।
- मामले से जुड़े सभी दस्तावेजों का गहन निरीक्षण किया जा चुका था।
- विभिन्न अंतरिम आवेदनों पर विस्तृत सुनवाई हो चुकी थी।
- कुल 9 गवाहों से पूछताछ और जिरह की प्रक्रिया संपन्न हो चुकी थी।
- तमाम दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को रिकॉर्ड में शामिल किया जा चुका था।
समिति का यह स्पष्ट मत था कि इतनी उन्नत अवस्था में पहुंच चुकी जांच को किसी एक पक्ष के एकतरफा निर्णय से बाधित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस वर्मा का रुख और समिति की दलील
रिपोर्ट में उल्लेख है कि जस्टिस वर्मा ने शुरुआती दौर में अपने वकीलों के जरिए पूरी कार्यवाही में सक्रिय रूप से भाग लिया था। उन्होंने प्रक्रिया को चुनौती देने से लेकर गवाहों की जिरह तक हर कदम पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस वर्मा ने तब जांच से किनारा किया जब उन्हें अपनी ओर से साक्ष्य और गवाह पेश करने थे। समिति ने कहा कि यह समय ऐसा नहीं था कि जांच को भंग किया जाए या पहले से रिकॉर्ड में दर्ज साक्ष्यों को खारिज कर दिया जाए। जस्टिस वर्मा के पास अपना पक्ष रखने के पर्याप्त अवसर थे, लेकिन निर्धारित समयसीमा में वे अपने बचाव पक्ष के गवाहों की सूची और हलफनामे पेश करने में विफल रहे थे। इसके बाद समिति ने उनके वकीलों को कार्यमुक्त कर दिया और अपनी रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की।
कानूनी चुनौती और अदालती रुख
जस्टिस वर्मा ने संसद द्वारा शुरू की गई इस जांच को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी थी। जनवरी 2026 में जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि जजों को मिलने वाला संवैधानिक संरक्षण उन्हें जवाबदेही से ऊपर नहीं उठाता है। अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी कि राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव पेश न होने या उपराष्ट्रपति के पद रिक्त होने से लोकसभा की जांच प्रक्रिया पर कोई असर पड़ता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा विवाद 14 मार्च 2025 की रात दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर लगी आग के साथ शुरू हुआ था। आग बुझाते समय वहां से भारी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद हुई थी, जो विवाद का केंद्र बनी। आंतरिक जांच में उनके द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण को संतोषजनक नहीं माना गया। इसके बाद तत्कालीन सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना ने उन्हें पद छोड़ने या संवैधानिक प्रक्रिया का सामना करने की सलाह दी थी। 21 जुलाई 2025 को संसद के दोनों सदनों में उन्हें हटाने के लिए नोटिस दिए गए थे।
जांच समिति का गठन
लोकसभा अध्यक्ष ने 12 अगस्त को प्रस्ताव स्वीकार कर समिति का गठन किया था। समिति में शुरुआत में जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस मनिंदर मोहन श्रीवास्तव और वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य शामिल थे। बाद में जस्टिस श्रीवास्तव के सेवानिवृत्त होने पर जस्टिस चंद्रशेखर को समिति में शामिल किया गया था। समिति ने पूरी रिपोर्ट केवल उपलब्ध दस्तावेजों, मौखिक साक्ष्यों और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स के आधार पर तैयार की है, न कि किसी के दबाव में।
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