खंडवा की 101 साल पुरानी तिरंगा बर्फी: स्वतंत्रता संग्राम का गवाह रही है यह खास मिठाई जीवनशैली एक घंटा पहले 2
मध्य प्रदेश के खंडवा में एक ऐसी मिठाई मशहूर है जिसे महात्मा गांधी ने भी चखा था। तिरंगा बर्फी के नाम से जानी जाने वाली यह मिठाई अपनी 101 साल पुरानी विरासत के कारण हर साल 15 अगस्त के मौके पर लोगों की पहली पसंद बन जाती है।

मिठास में देशभक्ति का अनूठा संगम

मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में एक ऐसी मिठाई है जो न केवल अपने अद्भुत स्वाद के लिए जानी जाती है, बल्कि इसका इतिहास सीधे तौर पर देश की आजादी की लड़ाई से भी जुड़ा है। केसरिया, सफेद और हरे रंगों की तीन परतों से सजी यह तिरंगा बर्फी शहर की पहचान बन चुकी है। करीब 101 साल पहले शुरू हुई यह परंपरा आज भी पूरी शुद्धता और उसी पारंपरिक स्वाद के साथ जीवित है। खास बात यह है कि इस मिठाई को न केवल आम लोगों ने पसंद किया, बल्कि देश के बड़े राजनेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों ने भी इसका स्वाद लिया है।

आजादी के आंदोलन से जुड़ा इतिहास

इस अनूठी मिठाई के सफर की शुरुआत साल 1920 में हुई थी। इसे खंडवा के अग्रवाल परिवार के मुखिया रहे रामसहाय जी अग्रवाल ने तैयार करना शुरू किया था। राजस्थान से आकर खंडवा में बसे इस परिवार ने अपने मिठाई के कारोबार को यहीं स्थापित किया। उस दौर में जब पूरा देश ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, उस समय तिरंगे के रंगों से प्रेरित होकर इस मिठाई को खास तौर पर तैयार किया गया। यह बर्फी उस दौरान लोगों के बीच देशभक्ति की भावना को और भी मजबूत करने का एक माध्यम बनी थी।

महात्मा गांधी ने भी चखा था स्वाद

इस मिठाई से जुड़ी सबसे गौरवशाली याद साल 1942 की है, जब महात्मा गांधी खंडवा के दौरे पर आए थे। उस समय खंडवा आजादी की गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था। बताया जाता है कि उस दौरान महात्मा गांधी ने इस तिरंगा बर्फी का स्वाद चखा था। इस ऐतिहासिक घटना का जिक्र आज भी खंडवा के लोग गर्व के साथ करते हैं। यह मिठाई न केवल स्वाद के लिए बल्कि अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण भी शहर की एक अमूल्य धरोहर मानी जाती है।

चार पीढ़ियों से जारी है यह परंपरा

रामसहाय जी अग्रवाल के बाद इस मिठाई के कारोबार को उनके पुत्र रामगोपाल जी ने संभाला और इसे आगे बढ़ाया। इसके बाद, साल 1986 में परिवार की तीसरी पीढ़ी के सदस्य दीपू अग्रवाल ने इस काम को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। वर्तमान में परिवार की चौथी पीढ़ी के सदस्य पुलकित अग्रवाल और निहुल अग्रवाल इस विरासत को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। परिवार का स्पष्ट मानना है कि इतने लंबे समय तक कारोबार चलाने के बावजूद उन्होंने मिठाई की गुणवत्ता, शुद्धता और उसके स्वाद के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया। यही कारण है कि दशकों बाद भी ग्राहक पुरानी विश्वास की डोर से इस दुकान के साथ जुड़े हुए हैं।

कैसे तैयार होती है यह खास मिठाई

तिरंगा बर्फी की लोकप्रियता के पीछे इसकी अनूठी बनावट और उसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री है। इसे तीन अलग-अलग परतों में तैयार किया जाता है:

  • केसरिया परत: इसमें असली केसर और गाजर का उपयोग किया जाता है।
  • सफेद परत: यह शुद्ध मावा और चीनी के मेल से तैयार की जाती है।
  • हरी परत: इसमें पिस्ता और पान के हल्के स्वाद का मिश्रण दिया जाता है।

ये तीनों परतें जब एक साथ आती हैं, तो मिठाई का रूप पूरी तरह से तिरंगे जैसा दिखाई देता है।

राष्ट्रीय पर्वों पर बढ़ती है मांग

आज के समय में तिरंगा बर्फी की लोकप्रियता केवल खंडवा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह निमाड़ क्षेत्र और आसपास के कई जिलों में भी प्रसिद्ध हो चुकी है। यद्यपि यह मिठाई शादी-विवाह और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में खूब पसंद की जाती है, लेकिन 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय त्योहारों के अवसर पर इसकी मांग कई गुना बढ़ जाती है। खंडवा के निवासियों के लिए स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर तिरंगा बर्फी खरीदना एक पारंपरिक रीति जैसा हो गया है, जो इस मिठाई की देशभक्ति वाली पहचान को और अधिक प्रगाढ़ बनाता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप