छत्तीसगढ़ की खास डिश: बरसात में लें कोईलार भाजी और दाल का मजा, इस पारंपरिक तरीके से घर पर तैयार करें जीवनशैली एक घंटा पहले 6
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में बरसात के मौसम में कोईलार भाजी और दाल बड़े चाव से बनाई जाती है। बिलासपुर की रहने वाली अन्नू सूर्यकांत ने इसे बनाने की बेहद आसान और पारंपरिक विधि साझा की है।

बरसात में कोईलार भाजी और दाल का अनोखा संगम

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में पारंपरिक खानपान का महत्व आज भी कायम है। यहां की थाली में स्थानीय और मौसमी साग-सब्जियों को प्राथमिकता दी जाती है। बरसात के इस मौसम में जब प्रकृति हरियाली से भर जाती है, तो पेड़ों पर उगने वाली कोईलार भाजी लोगों की पहली पसंद बन जाती है। इस भाजी को दाल के साथ मिलाकर जो व्यंजन तैयार होता है, उसका स्वाद लाजवाब और लाजवाब होने के साथ ही सेहतमंद भी होता है। बिलासपुर की रहने वाली गृहणी अन्नू सूर्यकांत ने हाल ही में इस पारंपरिक छत्तीसगढ़िया रेसिपी को बनाने का बेहद सरल और कारगर तरीका साझा किया है, जो स्वाद के शौकीनों को दीवाना बना सकता है।

पेड़ से थाली तक का सफर

अन्नू सूर्यकांत बताती हैं कि इस भाजी की खासियत इसकी ताजगी में छिपी है। सबसे पहले इसे पेड़ों से ताजी अवस्था में तोड़ा जाता है। बाजार में मिलने वाली सब्जियों की तुलना में पेड़ से सीधे तोड़ी गई भाजी का स्वाद अलग ही होता है। घर लाने के बाद इसे तैयार करने की प्रक्रिया बहुत सावधानी से की जाती है। सबसे पहले इसकी पत्तियों को अलग कर अच्छी तरह साफ किया जाता है। इसके बाद इसे कई बार शुद्ध पानी से धोया जाता है, ताकि इसमें मौजूद धूल, मिट्टी और अन्य अशुद्धियां पूरी तरह बाहर निकल जाएं। सफाई के बाद इसे पकाने के लिए अलग बर्तन में रख दिया जाता है।

देसी तड़के वाली भाजी की विधि

भाजी को लजीज बनाने के लिए सबसे पहले एक कड़ाही में थोड़ा तेल गर्म किया जाता है। जब तेल पर्याप्त गर्म हो जाए, तो इसमें जीरा, राई, सूखी लाल मिर्च, बारीक कटा हुआ प्याज और लहसुन डालकर सुनहरा होने तक भूना जाता है। जब प्याज का रंग हल्का सुनहरा हो जाए, तब इसमें पहले से धुली हुई कोईलार भाजी डाल दी जाती है। इसे मध्यम आंच पर अच्छी तरह चलाते हुए पकाया जाता है। इसके बाद इसमें कटे हुए ताजे टमाटर और स्वादानुसार नमक मिलाया जाता है। कड़ाही को ढककर इसे लगभग पांच मिनट तक पकने दिया जाता है, जिससे भाजी नरम और जायकेदार हो जाती है।

दाल के साथ शानदार मेल

इस रेसिपी का दूसरा अहम हिस्सा दाल तैयार करना है। सामान्य विधि से कुकर में दाल को पकाया जाता है, और जब कुकर में तीन सीटी आ जाएं, तो गैस बंद कर दी जाती है। कुकर का दबाव पूरी तरह खत्म होने के बाद जब ढक्कन खोला जाता है, तो इसमें पहले से तैयार की गई कोईलार भाजी को मिला दिया जाता है। भाजी और दाल का यह मेल स्वाद को एक अलग स्तर पर ले जाता है, जो साधारण दाल को भी एक विशेष व्यंजन में बदल देता है।

अंतिम तड़के से बढ़ता है स्वाद

भाजी और दाल के इस मिश्रण का स्वाद कई गुना बढ़ाने के लिए अंत में एक विशेष देसी तड़का लगाया जाता है। इसके लिए एक छोटे बर्तन में तेल गर्म किया जाता है। इसमें फिर से सूखी लाल मिर्च और लहसुन का तड़का तैयार किया जाता है। जब यह तड़का अच्छी तरह तैयार हो जाए, तो इसे दाल और भाजी के ऊपर डाल दिया जाता है। यह तड़का व्यंजन की खुशबू को पूरे घर में फैला देता है। अन्नू सूर्यकांत के अनुसार, यह पारंपरिक रेसिपी न केवल छत्तीसगढ़ की समृद्ध खानपान संस्कृति को जीवित रखती है, बल्कि बरसात के मौसम में पौष्टिकता भी प्रदान करती है। गांवों में यह व्यंजन वर्षों से बनता आ रहा है और आज भी लोगों की थाली का मुख्य हिस्सा बना हुआ है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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