धर्म
2 घंटे पहले
2
विचारों
पितृपक्ष में गयाजी का विशेष महत्व
बिहार के गयाजी में 25 सितंबर 2026 से पितृपक्ष महासंगम की शुरुआत होने जा रही है। इस पावन अवसर पर देश और दुनिया के कोने कोने से लाखों की संख्या में तीर्थयात्री अपने पितरों के मोक्ष की कामना लेकर गयाजी पहुंचेंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गयाजी स्थित विष्णुपद मंदिर के समीप यदि कोई व्यक्ति शमी के वृक्ष के एक पत्ते के बराबर भी अन्न पितरों को अर्पित करता है, तो उसके सात गोत्र और 101 कुल का उद्धार हो जाता है। फल्गु नदी के तट पर किए गए पिंडदान और तर्पण को अत्यंत फलदायी माना गया है, जिससे माता-पिता सहित कुल की सात पीढ़ियों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और पिंडदान करने वाला व्यक्ति स्वयं भी परमगति का अधिकारी बनता है।
संतान न होने पर कौन कर सकता है पिंडदान?
अक्सर कई परिवारों में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है जहाँ मृत दंपति की कोई संतान नहीं होती। ऐसे में परिजनों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उनकी आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और श्राद्ध कर्म कौन करेगा। इस संबंध में गया के कर्मकांडी ब्राह्मण चंदन कुमार कौशिक ने महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि किसी पुरुष या महिला की मृत्यु हो गई है और उनकी कोई संतान नहीं है, तो धार्मिक परंपराओं के अनुसार जीवनसाथी, यानी पत्नी या पति द्वारा श्राद्ध कर्म संपन्न करने की व्यवस्था है।
भाई या भतीजे की भूमिका
यदि मृतक के संतान नहीं है और उनका भाई जीवित है, तो भाई के द्वारा पिंडदान कराया जा सकता है। वहीं, यदि मृतक के भाई भी उपलब्ध न हों, तो परिवार की स्थापित परंपराओं के अनुरूप भतीजा उनके श्राद्ध और पिंडदान का कार्य संपन्न कर सकता है। परिस्थितियों के अनुसार परिवार के अन्य निकट संबंधी भी यह जिम्मेदारी उठा सकते हैं। कुछ विशेष परंपराओं में भांजे या अन्य नजदीकी रिश्तेदारों द्वारा भी पितरों के निमित्त धार्मिक कर्म करने का विधान मिलता है।
पुरोहित की सहायता से विकल्प
यदि परिवार में कोई भी ऐसा व्यक्ति मौजूद नहीं है जो पिंडदान कर सके, तो गयाजी में विशेष पुरोहितों की सहायता ली जा सकती है। पुरोहित के माध्यम से संकल्प लेकर निर्धारित धार्मिक विधि के अनुसार कर्म संपन्न कराया जा सकता है, ताकि मृतक की आत्मा को शांति मिल सके और परंपरा का निर्वहन हो सके।
जीवित रहते हुए आत्म-पिंडदान का विधान
गया के कर्मकांडी पुरोहित ने एक और दिलचस्प जानकारी दी है। हिंदू धर्म में जीवित रहते हुए अपने लिए पिंडदान करने की भी एक परंपरा है, जिसे जीवित-पिंडदान या आत्म-पिंडदान कहा जाता है। हालांकि, यह निर्णय लेने के बाद व्यक्ति को अत्यंत कठिन नियमों का पालन करना पड़ता है।
- स्वयं का पिंडदान करने के उपरांत व्यक्ति को सांसारिक जीवन से पूरी तरह दूरी बनानी होती है।
- ऐसे व्यक्ति को किसी नदी के तट पर निवास करना पड़ता है।
- उन्हें स्वयं भोजन बनाना पड़ता है।
- जब तक वे जीवित हैं, तब तक उन्हें इन कठोर नियमों का जीवनभर पालन करना अनिवार्य होता है।
इस प्रकार, शास्त्र और परंपराओं में हर स्थिति के लिए समाधान मौजूद हैं, बस उन्हें उचित विधि और संकल्प के साथ करने की आवश्यकता होती है।
Comments
0 comment