उपनाम: धार्मिक परंपरा
बाड़मेर में कृष्ण भक्ति की अनोखी परंपरा, 200 साल से महिलाएं राधा भाव में मना रही हैं नंदोत्सव
राजस्थान के बाड़मेर में स्थित वीर बालाजी हनुमान मंदिर में नंदोत्सव के दौरान एक खास परंपरा निभाई गई, जिसमें महिलाएं राधा के भाव में कृष्ण की भक्ति करती नजर आईं। यह रस्म यहां पिछले दो सौ सालों से लगातार चली आ रही है।
कुशाग्रहणी अमावस्या: साल भर के पितृ कार्यों के लिए क्यों खास है इस दिन की कुशा, जानें उखाड़ने की सही विधि
भाद्रपद अमावस्या को कुशाग्रहणी अमावस्या के रूप में जाना जाता है, जिसमें साल भर के धार्मिक और पितृ कार्यों के लिए कुशा घास को जड़ से उखाड़ने की विशेष परंपरा है। जानें ज्योतिषाचार्य से इसके महत्व, शुभ समय और विधि-विधान के बारे में।
गणेश विसर्जन क्यों किया जाता है? जानिए इस पावन परंपरा के पीछे की पौराणिक कथा और महत्व
गणेश चतुर्थी के दस दिवसीय उत्सव के समापन पर गणेश विसर्जन की परंपरा निभाई जाती है। आइए जानते हैं कि आखिर विसर्जन क्यों किया जाता है और साल 2026 में इसका शुभ मुहूर्त क्या है।
अंबाला का ऐतिहासिक फूल डोल मेला: ब्रिटिश काल से चली आ रही अनोखी परंपरा, जन्माष्टमी के बाद होता है आयोजन
हरियाणा के अंबाला में करीब 150 साल पुरानी फूल डोल मेले की परंपरा आज भी कायम है। जन्माष्टमी के अगले दिन आयोजित होने वाले इस मेले में दूर-दराज से श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ते हैं।
रक्षाबंधन के 18 दिन बाद क्यों मनाते हैं राखी? उत्तराखंड के इस समाज की अनोखी परंपरा के पीछे है गौतम ऋषि से जुड़ी कथा
उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में एक ऐसा समुदाय है जो देश के बाकी हिस्सों से अलग रक्षाबंधन का त्योहार मनाता है। यहाँ तिवारी समाज श्रावण पूर्णिमा के बजाय उसके 18 दिन बाद राखी का पर्व मनाता है, जिसके पीछे एक पौराणिक कथा है।
रक्षाबंधन विशेष: जयपुर में अपने भाई से पहले ठाकुर गोविंद देव जी को क्यों राखी बांधती हैं बहनें? जानिए इस अनोखी परंपरा का महत्व
जयपुर के आराध्य गोविंद देव जी मंदिर में रक्षाबंधन के पावन अवसर पर एक बेहद अनूठी और प्राचीन परंपरा निभाई जाती है, जहां भक्त भगवान को रक्षा सूत्र बांधकर अपनी सुरक्षा की कामना करते हैं।
नाग पंचमी 2026: आखिर क्यों मनाई जाती है गुड़िया पीटने की अनोखी परंपरा, जानिए इसके पीछे की पौराणिक कथा
17 अगस्त 2026 को नाग पंचमी का पर्व श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। इस अवसर पर उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में प्रचलित 'गुड़िया पीटने' की परंपरा के पीछे की पौराणिक मान्यताओं को विस्तार से जानें।
श्रीशैलम का अद्भुत चमत्कार: मल्लम्मा कन्नेरु में बिना सहारे खड़ा होता है मूसल, पूरी होती हैं मन्नतें
श्रीशैलम के नल्लामाला जंगलों में स्थित मल्लम्मा कन्नेरु में एक अनोखी परंपरा है, जहां भक्त ओखली में मूसल को बिना किसी सहारे के सीधा खड़ा करके अपनी मनोकामना मांगते हैं। इसे 14वीं शताब्दी की शिव भक्त हेमारेड्डी मल्लम्मा से जुड़ा चमत्कार माना जाता है।
महाकाल का खास प्रसाद: औषधीय गुणों वाली भांग, सावन में दोगुना हो जाता है इसका आकर्षण
उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर के पास स्थित एक पुरानी दुकान अपनी विशेष भांग के लिए प्रसिद्ध है, जिसे श्रद्धालु नशा नहीं बल्कि बाबा का प्रसाद मानकर ग्रहण करते हैं। सावन के महीने में इस खास ठंडाई की बिक्री में 50 प्रतिशत तक का उछाल देखा जाता है।
महेश्वर के जगन्नाथ धाम में भगवान का चल रहा है अनोखा आयुर्वेदिक इलाज, 15 दिनों के लिए बंद हुए मंदिर के कपाट
मध्य प्रदेश के खरगोन स्थित प्रसिद्ध महेश्वर जगन्नाथ धाम में स्नान पूर्णिमा के बाद अस्वस्थ हुए भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का विशेष आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से उपचार किया जा रहा है, जिसके कारण मंदिर के पट 15 दिनों के लिए बंद कर दिए गए हैं।
पूजा में नारियल का इस्तेमाल क्यों है अनिवार्य? जानिए त्रिदेव से जुड़ा इसका गहरा धार्मिक रहस्य
हिंदू धर्म में नारियल को श्रीफल के नाम से जाना जाता है और पूजा के हर शुभ कार्य में इसे विशेष महत्व दिया जाता है। जानिए क्यों नारियल को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना गया है और इसका आध्यात्मिक अर्थ क्या है।
मंदिर में घंटी बजाने का क्या है धार्मिक महत्व और सही नियम, जानें यहाँ
हिंदू धर्म में मंदिरों में घंटी बजाने की परंपरा बहुत पुरानी है, जो केवल एक रस्म नहीं बल्कि इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण छिपे हैं।
जयपुर का कल्याणजी मंदिर: साल में सिर्फ दो बार होते हैं ठाकुरजी के 24 रूपों के दुर्लभ दर्शन
जयपुर स्थित 200 साल पुराने कल्याणजी मंदिर में ठाकुरजी के 24 अवतारों के दर्शन का मौका श्रद्धालुओं को साल में केवल दो बार मिलता है।
वाराणसी: काशी में इस दिन 'बीमार' होते हैं भगवान जगन्नाथ, 236 वर्ष पुरानी अनोखी परंपरा का पूरा इतिहास जानिए
वाराणसी के अस्सी क्षेत्र में स्थित भगवान जगन्नाथ के प्राचीन मंदिर में हर साल ज्येष्ठ पूर्णिमा को अधिक स्नान के बाद भगवान 'बीमार' होकर 14 दिन एकांतवास में रहते हैं। यह परंपरा 236 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है।