बिहार
एक घंटा पहले
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विचारों
बिहार की सत्ता और संगठन के समीकरण इन दिनों नई करवट लेते दिख रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत रविवार को तीन दिन के दौरे पर पटना पहुंचे और सबसे चर्चित बात यह रही कि उन्हें रिसीव करने खुद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी एयरपोर्ट पहुंचे। न प्रदेश अध्यक्ष, न कोई मंत्री—भाजपा की ओर से स्वागत में सिर्फ सम्राट चौधरी ही नजर आए। यह दृश्य बता रहा है कि वे अब केवल भाजपा ही नहीं, बल्कि संघ के भी कितने करीब हो चुके हैं।
बिहार में पहली बार ऐसा नजारा
राज्य में करीब 20 सालों तक एनडीए का शासन रहा। नीतीश कुमार भाजपा के समर्थन से लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे, लेकिन उन्होंने कभी संघ प्रमुख को एयरपोर्ट पर रिसीव नहीं किया। सुशील कुमार मोदी जरूर उपमुख्यमंत्री रहते कई मौकों पर संघ प्रमुख की अगवानी के लिए पहुंचते थे, मगर उनके साथ भाजपा के कई और कद्दावर नेता भी मौजूद रहते थे। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहला अवसर है जब किसी सीएम ने खुद यह जिम्मेदारी संभाली, जो उनकी पार्टी के भीतर बढ़ती ताकत को दर्शाता है।
सम्राट चौधरी के सामने सिन्हा, शर्मा सब हुए फीके
संघ प्रमुख का स्वागत करना कोई मामूली घटना नहीं है। इसे केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। इस मौके पर न विजय कुमार सिन्हा दिखे, न प्रेम कुमार और न ही प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी नजर आए। भारतीय राजनीति में प्रतीकात्मक तस्वीरों का अपना महत्व होता है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री संघ प्रमुख का स्वागत करते रहे हैं, लेकिन वहां भी उनके साथ पार्टी के बड़े नेता और मंत्री मौजूद रहते हैं। बिहार में इस तरह की तस्वीर पहली बार सामने आई है, और यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सम्राट चौधरी का कद राज्य भाजपा के पुराने तमाम नेताओं से बड़ा हो गया है।
संघ प्रमुख का पहली बार किसी सीएम ने किया स्वागत
नीतीश कुमार ने अपने लंबे राजनीतिक सफर में संघ और भाजपा के साथ गठबंधन तो किया, लेकिन अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को हमेशा बनाए रखा। यही वजह रही कि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने संघ प्रमुख के प्रति सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई खास राजनीतिक संदेश देने से परहेज किया। सम्राट चौधरी का एयरपोर्ट पहुंचना बताता है कि बिहार में भाजपा अब अपनी वैचारिक पहचान को पहले से ज्यादा खुलकर सामने रखने के मूड में है।
उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा पहली बार राज्य में नेतृत्वकारी भूमिका में दिख रही है। अब पार्टी केवल गठबंधन की सहयोगी नहीं, बल्कि सत्ता का चेहरा बनकर उभर रही है। ऐसे में संघ के साथ सार्वजनिक निकटता दिखाना भाजपा के कोर समर्थक वर्ग को मजबूत संदेश देता है। आरएसएस और भाजपा के संबंधों पर हमेशा चर्चा होती रही है, लेकिन बिहार में लंबे समय तक यह रिश्ता पर्दे के पीछे ही ज्यादा दिखता रहा।
मुख्यमंत्री द्वारा संघ प्रमुख का स्वागत यह जताता है कि सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल है और उसे सार्वजनिक रूप से दिखाने में अब कोई झिझक नहीं। आने वाले वर्षों की राजनीति को देखते हुए भाजपा अपनी स्वतंत्र ताकत का प्रदर्शन करना चाहती है। भागवत का दौरा और मुख्यमंत्री का स्वागत संघ कार्यकर्ताओं और भाजपा कैडर के लिए मनोवैज्ञानिक ऊर्जा का काम कर सकता है, जिससे यह संदेश जाता है कि राज्य में संगठन और सरकार एक ही दिशा में चल रहे हैं।
नीतीश मॉडल बनाम सम्राट मॉडल
नीतीश कुमार का राजनीतिक मॉडल सामाजिक समीकरण, विकास और गठबंधन संतुलन पर टिका रहा। इसके उलट सम्राट चौधरी ऐसे दौर में मुख्यमंत्री बने हैं जब भाजपा पूरे देश में अपनी वैचारिक पहचान को खुलकर रख रही है। यही वजह है कि दोनों नेताओं की राजनीतिक शैली में अंतर साफ झलकता है। जहां नीतीश संघ से दूरी और भाजपा से साझेदारी का संतुलन साधते रहे, वहीं सम्राट चौधरी भाजपा और संघ की वैचारिक एकजुटता को सार्वजनिक रूप से दिखाते नजर आ रहे हैं।
क्या संघ ने भी दिया बड़ा संदेश?
राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी उठ रहा है कि भागवत का बिहार दौरा और मुख्यमंत्री द्वारा उनका स्वागत महज औपचारिक कार्यक्रम था या इसके पीछे भविष्य की कोई रणनीति भी जुड़ी है। संघ आमतौर पर सीधे राजनीतिक संदेश देने से बचता है, लेकिन उसके कार्यक्रमों और नेताओं की गतिविधियों को राजनीतिक नजरिए से हमेशा पढ़ा जाता है। ऐसे में भाजपा नेतृत्व वाली सरकार और संघ प्रमुख की यह तस्वीर आने वाले समय में कई नई चर्चाओं को जन्म दे सकती है।
बिहार की राजनीति में तस्वीरें अक्सर भविष्य के संकेत देती हैं। रविवार को एयरपोर्ट पर सम्राट चौधरी द्वारा मोहन भागवत का स्वागत भी ऐसी ही एक तस्वीर बन गई है। इसे सिर्फ एक स्वागत नहीं, बल्कि भाजपा के नए बिहार मॉडल, संघ-सरकार समन्वय और राज्य में बदलते राजनीतिक शक्ति-संतुलन का प्रतीक माना जा रहा है। राज्य में भाजपा का मुख्यमंत्री बनना ही अपने आप में बड़ा बदलाव है। लंबे समय तक जेडीयू-भाजपा साझेदारी का चेहरा नीतीश कुमार रहे, पार्टी संगठनात्मक रूप से मजबूत होती गई, लेकिन सत्ता का शीर्ष पद उसके पास नहीं था। सम्राट चौधरी की सक्रियता और संघ प्रमुख के स्वागत का यह दृश्य कई स्तरों पर अहम संदेश दे रहा है।
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