झारखंड
एक घंटा पहले
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विचारों
भारत को आदिकाल से ही कृषि प्रधान देश माना गया है। यहां खेती-किसानी केवल पेट भरने का साधन नहीं है, बल्कि यह हमारे लोक जीवन, त्योहारों और अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है। देश के विभिन्न कोनों में फसलों की बुवाई और कटाई से जुड़ी कई तरह की लोक परंपराएं प्रचलित हैं। इसी कड़ी में झारखंड के पलामू जिले में धान की रोपाई (धान रोपनी) के दौरान एक बेहद खूबसूरत और प्राचीन परंपरा आज भी पूरी शिद्दत के साथ जीवित है। खेतों में जब महिलाएं धान के पौधों की रोपाई करती हैं, तो उनके कंठ से फूटने वाले पारंपरिक लोकगीत पूरे माहौल को संगीतमय और ऊर्जावान बना देते हैं। ये मधुर गीत न केवल उनके कठिन परिश्रम को आसान बनाते हैं, बल्कि हमारी लोक संस्कृति और सामाजिक ताने-बाने की एक अनूठी झलक भी पेश करते हैं।
देवताओं की स्तुति और अच्छी फसल की कामना
धान रोपने की इस पारंपरिक शुरुआत में सबसे पहला स्थान ईश्वर की आराधना को दिया गया है। खेतों में काम शुरू करने से पहले ग्रामीण महिलाएं सबसे पहले धरती माता और भगवान का स्मरण करती हैं। वे उनसे प्रार्थना करती हैं कि इस साल अच्छी बारिश हो, फसलों की पैदावार भरपूर हो और पूरे गांव में सुख-समृद्धि बनी रहे। इस धार्मिक अनुष्ठान और स्तुति के बाद ही रोपाई का काम आगे बढ़ता है। शुरुआत के इन भक्ति गीतों के बाद, समय और माहौल के हिसाब से महिलाएं मनोरंजन, प्रेम, प्रकृति और रोजमर्रा के जीवन से जुड़े विभिन्न लोकगीत गाती हैं। बुजुर्गों के अनुसार, यह अनूठी परंपरा कई पीढ़ियों से लगातार चली आ रही है और आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इसे पूरे आदर और उत्साह के साथ निभाते हैं।
थकान मिटाने और सांस्कृतिक विरासत सहेजने का माध्यम
पलामू जिले के अंतर्गत आने वाले चैनपुर प्रखंड के पूरबडीह गांव में इन दिनों खेतों में ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। यहां धान की रोपाई कर रही स्थानीय महिलाओं ने बताया कि यह कला और ये गीत उन्हें अपनी मां, दादी और नानी से विरासत के रूप में मिले हैं। आज के आधुनिक दौर में भी नई पीढ़ी की युवतियां और महिलाएं इन गीतों को गाकर अपनी इस अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का काम कर रही हैं। खेतों में काम कर रहीं दुखनी कुंवर ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए बताया कि जब वे खेतों में समूह बनाकर गीत गाती हैं, तो घंटों लगातार काम करने के बाद भी उन्हें शारीरिक थकान का अहसास नहीं होता। गीतों की धुन और सुरों के मिलन से पूरा खेत और आसपास का वातावरण एक सकारात्मक ऊर्जा और उमंग से भर जाता है।
मजदूरी, श्रम और समय का सटीक गणित
धान रोपने की यह प्रक्रिया केवल गीतों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें महिलाओं के श्रम और समय का एक बहुत ही सटीक और पारंपरिक तालमेल भी देखने को मिलता है। महिलाओं के अनुसार, आम तौर पर आठ महिलाएं मिलकर एक समूह बनाती हैं। यह समूह महज दो घंटे के भीतर लगभग एक बीघा खेत में धान की रोपाई का काम पूरी कुशलता के साथ समाप्त कर देता है। इस सामूहिक श्रम के बदले में उन्हें कुल मिलाकर लगभग तीन हजार रुपये की मजदूरी मिलती है। आज के समय में जब खेती में आधुनिक मशीनों और वैज्ञानिक उपकरणों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, ऐसे में पलामू के ग्रामीण इलाकों में हाथ से रोपाई करने और इस दौरान सामूहिक रूप से लोकगीत गाने की यह प्रथा ग्रामीण जीवन की एक मजबूत पहचान बनकर टिकी हुई है।
विविध विषयों को समेटे होते हैं ये गीत
धान की रोपाई के दौरान गाए जाने वाले इन लोकगीतों का दायरा बहुत व्यापक है। महिलाएं जब खेतों में कतार बनाकर खड़ी होती हैं, तो वे एक सुर में सुर मिलाकर गाती हैं। इन गीतों में केवल ईश-वंदना ही नहीं होती, बल्कि इसमें पारिवारिक रिश्तों की मिठास, पति-पत्नी के बीच का प्रेम, जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव और कई तरह के महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश भी छिपे होते हैं। स्थानीय ग्रामीणों का दृढ़ विश्वास है कि जब किसी फसल को पूरी श्रद्धा, भक्ति और सकारात्मक मन से रोपा जाता है, तो वह फसल केवल अन्न नहीं देती, बल्कि परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करती है। यही कारण है कि धान की रोपाई का यह समय किसी उत्सव से कम नहीं लगता, जहां कड़ी मेहनत भी सुरों की मिठास में घुलकर एक आनंदमयी अनुभव बन जाती है।
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