राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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सड़क पर हिंसा और न्याय की परिभाषा
हाल ही में गुरुग्राम से सामने आई हिट एंड रन की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो और तस्वीरों ने साफ दिखाया है कि किस तरह सड़क पर अपनी मर्ज़ी से चलने वाली एक युवती को कार सवार युवकों ने निशाना बनाया। सिया उर्फ शिवानी चौहान अपनी बाइक पर सवार होकर जा रही थीं, तभी कार सवार कल्याण बैंसला ने अपनी गाड़ी से उन्हें टक्कर मार दी। यह महज एक दुर्घटना नहीं थी, बल्कि इसमें छिपी हिंसा साफ तौर पर नजर आ रही थी। शराब के नशे या फिर झूठी मर्दानगी के अहंकार में डूबे आरोपी ने उस लड़की को कुचलने की कोशिश की, जो समाज के बंधनों को तोड़कर अपने सपनों की उड़ान भर रही थी। लड़की सड़क पर गिरी, घिसटी, लेकिन हिम्मत हारने के बजाय वह फिर से खड़ी हुई। अब पुलिस इस मामले में कानूनी कार्रवाई कर रही है, लेकिन जिस समाज की जिम्मेदारी एक बेटी की सुरक्षा सुनिश्चित करने की है, उसका चेहरा अब पूरी तरह बेनकाब हो गया है।
जाति के नाम पर अपराधी का समर्थन
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि आरोपी कल्याण बैंसला को बचाने के लिए अब पलवल में एक महापंचायत बुलाई जा रही है। हैरानी की बात यह है कि इस आयोजन का आधार जाति है। लोग सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से अधिक से अधिक संख्या में जुटने की अपील कर रहे हैं ताकि अपनी ही जाति के इस लड़के को सही साबित किया जा सके। क्या अपराध का कोई धर्म या जाति होती है? एक महिला को जान से मारने की कोशिश करने वाले व्यक्ति के समर्थन में भीड़ जुटाना इस बात को दर्शाता है कि समाज के एक वर्ग में नैतिकता का कितना गहरा पतन हो चुका है। यह 'लड़के हैं, गलती हो जाती है' वाली वही दकियानूसी मानसिकता है, जो दशकों से महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को बढ़ावा देती रही है।
समाज की पंगु सोच और नैतिकता का पतन
हम उस भारत भूमि में रहते हैं जिसका इतिहास सत्य, धर्म और न्याय के लिए सर्वस्व त्याग करने वाले नायकों की गाथाओं से भरा पड़ा है। लेकिन आज की स्थिति को देखकर लगता है कि क्या हमारी सामाजिक मान्यताएं और ऐतिहासिक संस्कार केवल किताबों तक सीमित रह गए हैं? जब समाज का एक वर्ग अपराधी और पीड़ित के बीच खड़ा होकर जाति का चश्मा पहन ले, तो उसे पूरी तरह से पंगु और विकलांग सोच ही कहा जाएगा। आरोपी को बचाने की यह कोशिश केवल एक व्यक्ति का बचाव नहीं है, बल्कि यह कानून और न्याय व्यवस्था पर एक सीधा हमला है। सवाल यह है कि आखिर हम किस ओर बढ़ रहे हैं? क्या हमारी पुरुषवादी सोच पशुता के स्तर तक गिर चुकी है कि हम एक बेटी पर हुए अत्याचार को भी जाति की सीढ़ी से ढंकना चाहते हैं?
पंचायत की साख पर लगा बड़ा प्रश्नचिह्न
महापंचायत का आयोजन करने वाले लोग भले ही यह दावा करें कि वे अपनी जाति के गौरव की रक्षा कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में वे अपराधी को संरक्षण देकर समाज को शर्मसार कर रहे हैं। राजनेताओं और राजनीति को जातिवाद के लिए कोसने वाले लोग खुद आज जाति को अपने पाप छिपाने की ढाल बना रहे हैं। यह महापंचायत सफल होती है या नहीं, इसका कानूनी प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है, लेकिन इसने सामूहिक चेतना पर एक बहुत गहरा घाव कर दिया है। आज हर जागरूक नागरिक को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि क्या पंचायतों का अर्थ अब केवल अपराधियों को संरक्षण देना रह गया है? क्या अब पंचों की साख अपराधी को बचाकर ही तय होगी? यह सब देखना अत्यंत दुखद है, क्योंकि अंततः इससे न केवल न्याय की हार होती है, बल्कि समाज का वह ढांचा भी ढह जाता है जो आपसी भरोसे पर टिका होता है। अब यह समाज को ही तय करना है कि क्या वे एक अपराधी के साथ खड़े होकर अपनी जाति की अस्मिता ढूंढेंगे, या फिर वे न्याय और मानवता का पक्ष लेंगे। कानून अपना काम करेगा, लेकिन समाज का यह दाग बहुत गहरा है।
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