उपनाम: ग्रामीण जीवन
बरसात में जंगलों से चुनकर लाते हैं ये खास पत्ता, चावल के माड़ के साथ बनती है लाजवाब सब्जी
छत्तीसगढ़ के सरगुजा में ग्रामीण बरसात के दौरान जंगलों से कोचई पत्ते लाते हैं और उसे सुखाकर चावल के माड़ के साथ एक खास पारंपरिक डिश तैयार करते हैं। यह तरीका उन्हें बाजार पर निर्भर रहने से बचाता है और स्वाद में भी लाजवाब है।
झारखंड के पलामू में आज भी जीवित है धान रोपनी के लोकगीतों की परंपरा, देवताओं की आराधना के साथ खेतों में गूंजते हैं सुर
झारखंड के पलामू जिले में धान की रोपाई के दौरान महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीत न केवल कृषि कार्य की थकान मिटाते हैं, बल्कि हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत रखते हैं।
जहानाबाद की 70 वर्षीय दादी ने खोला राज, क्यों मेहमानों को शरबत से पहले खिलाई जाती थी काली मिर्च
70 वर्षीय प्रतिमा देवी ने बदलते दौर और पुरानी जीवनशैली का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे पहले के समय में मेहमानों की सेहत का ख्याल रखा जाता था और लू से बचाने के लिए काली मिर्च का इस्तेमाल कैसे किया जाता था।
20 साल पहले बिना साबुन-डिटर्जेंट के कैसे चमकाए जाते थे बर्तन? तरीका जानकर रह जाएंगे हैरान
आज बाजार में बर्तन साफ करने के तमाम प्रोडक्ट मौजूद हैं, लेकिन करीब 20 साल पहले गांवों में महिलाएं धान की पराली, चूल्हे की राख और नारियल के छिलके से ही बर्तनों का कालापन दूर करती थीं।
अनाज से कंकड़ और खरपतवार अलग करने का पुराना औजार था 'बिकना', कभी हर रसोई की पहचान
बिकना लोहे की चादर से बना एक पारंपरिक यंत्र था, जिससे गांव की महिलाएं दाल और अनाज में से कंकड़ व खरपतवार अलग करती थीं। आज आधुनिक मशीनों के चलते यह विलुप्ति के कगार पर पहुंच गया है।
लालटेन की रोशनी में पढ़कर बने अफसर, आज खुद इतिहास बनने की कगार पर वही विरासत
कभी गांवों में पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी का सहारा रही लालटेन अब बिजली और सोलर लाइट के दौर में लगभग विलुप्त हो चली है। बुजुर्ग बताते हैं कि इसी रोशनी में पढ़कर कई लोग आज बड़े पदों पर पहुंचे हैं।
Dharohar: आई माता मंदिर के बाहर बसी है पुराने राजस्थान की विरासत, सिर्फ 10 रुपये में देखें जीवंत झलक
जोधपुर के बिलाड़ा स्थित आई माता मंदिर के बाहर बना विरासत स्थल राजस्थान के पारंपरिक ग्रामीण जीवन को सहेजे हुए है, जहां 10 रुपये का सिक्का डालते ही पुरानी व्यवस्थाएं जीवंत हो उठती हैं।