जब सड़कों पर कारें नहीं दौड़ती थीं, जोधपुर के बाजारों में बजती थीं ऊंटों की घंटियां, पढ़िए मारवाड़ी व्यापार की कहानी राजस्थान एक घंटा पहले 3
जोधपुर के घंटाघर, सरदार मार्केट और सोजती गेट कभी ऊंटों के काफिलों से गुलजार रहते थे, जब यही जानवर मारवाड़ में व्यापार और आवागमन की रीढ़ हुआ करते थे।

आज जोधपुर का घंटाघर, सरदार मार्केट और सोजती गेट इलाका भले ही आधुनिक बाजारों के रूप में जाना जाता हो, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब इन्हीं गलियों की चहल-पहल ऊंटों के काफिलों से तय होती थी। उस समय न कारें थीं और न ही आज जैसे साधन, फिर भी यहां का कारोबार पूरे जोर पर चलता था।

ऊंटों के काफिलों से गुलजार रहते थे बाजार

दूर-दराज के गांवों से व्यापारी अपने ऊंटों पर अनाज, मसाले, कपड़ा और तरह-तरह का सामान लादकर शहर के इन बाजारों तक पहुंचते थे। बिकने और खरीदे जाने वाले माल का यही मुख्य जरिया था, और इसी आवाजाही से बाजारों में रौनक बनी रहती थी।

आवागमन का सबसे भरोसेमंद साधन

घंटाघर निवासी नाजिर नियाज बताते हैं कि उस जमाने में ऊंट ही व्यापार और आने-जाने का सबसे विश्वसनीय साधन माना जाता था। लंबी दूरी तय करने और भारी सामान ढोने के लिए लोग इन्हीं पर निर्भर रहते थे।

सोजती गेट से गिर्दीकोट तक गूंजती घंटियां

उनके मुताबिक सोजती गेट से लेकर गिर्दीकोट तक ऊंटों के गले में बंधी घंटियों की आवाज लगातार सुनाई देती रहती थी। यह आवाज उस दौर के बाजारों की पहचान बन चुकी थी।

मारवाड़ की अर्थव्यवस्था की रीढ़

मारवाड़ की अर्थव्यवस्था और व्यापारिक गतिविधियों में ऊंटों की भूमिका बेहद अहम मानी जाती थी। यही वजह है कि इन्हें इस क्षेत्र के कारोबार की रीढ़ कहा जाता था, जिसके बिना उस समय का व्यापार अधूरा था।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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