बिहार
2 घंटे पहले
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अगर आपकी नज़र में पटना सिर्फ इसकी सड़कों, इमारतों और ऐतिहासिक स्मारकों तक सीमित है, तो एक बार 'प्लानेट पटना' का रुख ज़रूर कीजिए। डाकबंगला चौराहे पर स्थित डुमरांव पैलेस के पहले तल पर बना यह अनूठा संग्रहालय शहर के उस रूप से मिलवाता है, जो अब इतिहास के पन्नों में सिमट चुका है।
20वीं सदी के नामी उद्योगपति दीवान बहादुर राधाकृष्ण जालान ने वर्षों तक जिन दुर्लभ वस्तुओं, दस्तावेजों और यादगारों को सहेजा था, उन्हें उनके परपोते आदित्य जालान ने म्यूजियम का स्वरूप देकर आम लोगों के लिए खोल दिया है। यहां कदम रखते ही ऐसा अनुभव होता है मानो पटना के बीते दौर की जीवंत यात्रा शुरू हो गई हो। शहर के पहले स्कूल, कॉलेज और लाइब्रेरी से लेकर अस्पताल, खेल, सिनेमा हॉल, पार्क और पेंटिंग तक से जुड़ी कई दिलचस्प जानकारियां यहां मौजूद हैं।
दो हिस्सों में बंटा है यह अनोखा संग्रहालय
म्यूजियम के एमडी अज़फर अहमद ने लोकल 18 को बताया कि इस संग्रहालय को दो प्रमुख भागों में विकसित किया गया है — पहला आर्काइवल सेक्शन और दूसरा म्यूजियम सेक्शन। इसके साथ ही यहां मल्टीपर्पज हॉल, क्लब और कैफे की सुविधाएं भी दी गई हैं।
आर्काइवल सेक्शन में वर्ष 1900 से 1950 के बीच के दुर्लभ रिकॉर्ड और दस्तावेज संरक्षित किए गए हैं, जिनके ज़रिए पटना के इतिहास और उस दौर के सामाजिक जीवन को बारीकी से समझा जा सकता है। यहां प्रसिद्ध उद्योगपति, समाजसेवी और कला संग्राहक रहे दीवान बहादुर राधाकृष्ण जालान के निजी पत्र, निमंत्रण पत्र, फोटोग्राफ, बिल और दूसरे अहम दस्तावेजों का संग्रह रखा गया है, जो उस समय के पटना की हलचल और सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल की झलक देते हैं।
अज़फर अहमद के अनुसार, राधाकृष्ण जालान की पहचान एक बड़े कला संग्राहक के रूप में भी रही। पटना सिटी स्थित ऐतिहासिक किला हाउस उनका निवास था, जहां उन्होंने वर्षों तक दुर्लभ और नायाब वस्तुएं जुटाईं। उन्हीं से जुड़ी कई बहुमूल्य चीज़ें और यादगार आज प्लानेट पटना में प्रदर्शित हैं। यहां आने वाले लोग न सिर्फ उनके जीवन को जान सकते हैं, बल्कि पुराने पटना की विरासत और संस्कृति से भी रूबरू होते हैं।
पहले स्कूल से लेकर पुराने सिनेमा हॉल तक की दास्तान
म्यूजियम की यात्रा आर्काइवल सेक्शन से शुरू होती है, जहां पटना के शैक्षणिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की विस्तृत झलक मिलती है। इस हिस्से में शहर के पहले स्कूल से लेकर कई पुराने स्कूलों, कॉलेजों, लाइब्रेरी, शोध संस्थानों और विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े दुर्लभ दस्तावेज रखे गए हैं।
इसके अलावा पुराने सिनेमा हॉल, नृत्य व संगीत कार्यक्रमों, मेडिकल कॉलेजों के उद्घाटन समारोहों, सिविल डिफेंस हॉस्पिटल ट्रेन, पटना के पहले पार्क और अलग-अलग खेल गतिविधियों से जुड़ी अहम जानकारियां भी यहां संरक्षित हैं।
लंदन तक फैले थे रिश्ते
इस संग्रह में कई ऐतिहासिक दस्तावेज भी शामिल हैं। कलकत्ता के विक्टोरिया मेमोरियल हॉल के उद्घाटन समारोह में शामिल होने के लिए राधाकृष्ण जालान को भेजा गया निमंत्रण पत्र यहां सुरक्षित है। साथ ही ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के राज्याभिषेक समारोह का आमंत्रण भी इस संग्रह का हिस्सा है। उस दौर की गार्डन पार्टियों और होम पार्टियों के निमंत्रण पत्र भी यहां देखे जा सकते हैं।
इसके अलावा सरस्वती पूजा, गणेश महोत्सव, होली और दूसरे सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों से जुड़े दस्तावेज भी प्रदर्शित किए गए हैं। ये सभी रिकॉर्ड साफ बताते हैं कि उस समय राधाकृष्ण जालान बिहार की प्रमुख हस्तियों में से एक थे। पटना और बिहार के प्रतिष्ठित परिवारों, अंग्रेज अधिकारियों और राजाओं-महाराजाओं से लेकर लंदन तक उनके संबंध फैले हुए थे।
पेंटिंग्स का अनमोल खज़ाना
प्लानेट पटना का दूसरा हिस्सा म्यूजियम सेक्शन है। राधाकृष्ण जालान के पोते बाल मनोहर जालान भी बड़े कला संग्राहक रहे। इस सेक्शन में विभिन्न पेंटिंग्स की झलक मिलती है, जिन्हें अलग-अलग शैलियों के आधार पर बांटा गया है — जैसे मुर्शिदाबाद स्कूल, पटना स्कूल, अवध स्कूल, बनारस स्कूल, तंजोर स्कूल और त्रिचिनोपॉली स्कूल।
एमडी अज़फर अहमद बताते हैं कि अंग्रेज अपने साथ आठ पेंटर लेकर आते थे और यहां के स्थानीय कलाकारों को सिखाकर उनसे तरह-तरह की पेंटिंग बनवाते थे, फिर उनमें से सात अपने साथ ले जाते थे। उन्हीं तमाम पेंटिंग्स की झलक इस सेक्शन में देखने को मिलती है।
मल्टीपर्पज हॉल के साथ क्लब और कैफे
प्लानेट पटना में एक अत्याधुनिक मल्टीपर्पज हॉल भी बनाया गया है, जहां प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में पटना और बिहार की गतिविधियों से जुड़ी रोचक जानकारियां मिलती हैं। यह हॉल केवल प्रदर्शनी तक सीमित नहीं, बल्कि समय-समय पर होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों का केंद्र भी है।
परिसर में एक खास क्लब एरिया भी है, जिसे कला, साहित्य और संस्कृति में रुचि रखने वाले लोगों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। यहां प्रवेश मेंबरशिप के आधार पर मिलता है। क्लब में कला और इतिहास से जुड़ी कई अहम किताबें उपलब्ध हैं, जिन्हें सदस्य पढ़ और समझ सकते हैं। साथ ही एक कैफे भी है, जहां बैठकर लोग चाय-कॉफी के साथ इतिहास, कला और संस्कृति पर चर्चा का लुत्फ ले सकते हैं। यह पूरा परिसर महज़ एक म्यूजियम नहीं, बल्कि पटना की विरासत को जानने और महसूस करने की बेहतरीन जगह बन गया है।
घूमने का समय
प्लानेट पटना म्यूजियम हफ्ते के सातों दिन खुला रहता है। यहां दोपहर 1 बजे से रात 8 बजे तक प्रवेश किया जा सकता है। ऐसे में लोग अपनी सुविधा के अनुसार शाम के समय भी पहुंचकर पटना के इतिहास, कला और संस्कृति से जुड़ी दुर्लभ विरासत को करीब से देख सकते हैं।
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