OPINION: 'जादूगर' अशोक गहलोत किसकी साजिश में उलझे, क्यों फिर हरा हुआ 4 साल पुराना घाव? राजस्थान एक घंटा पहले 2
अशोक गहलोत का दावा है कि 2022 में उनके खिलाफ 'साजिश' हुई, वरना आज वे कांग्रेस अध्यक्ष होते। पर सवाल यह है कि क्या वे किसी साजिश का शिकार हुए या अपने ही बुने जाल में फंस गए, क्योंकि दिल्ली की सत्ता चाहते हुए भी वे जयपुर का मोह नहीं छोड़ पाए।

राजस्थान की सियासत में ‘जादूगर’ के नाम से पहचाने जाने वाले अशोक गहलोत ने एक बार फिर अपनी छड़ी घुमाई है, मगर इस मर्तबा कोई करिश्मा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि बरसों पुरानी कसक को सामने रखने के लिए। पूर्व मुख्यमंत्री ने हाल में जो बातें कही हैं, उन्होंने न केवल कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी को सबके सामने ला खड़ा किया है, बल्कि कई ऐसे सवाल भी पैदा कर दिए हैं जिनके जवाब शायद खुद गहलोत के पास भी पहले से तय और गढ़े हुए ही हों।

गहलोत का कहना है कि 2022 में उनके खिलाफ एक बड़ी ‘साजिश’ रची गई थी। साजिश यह कि वे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष न बन पाएं और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ही अटके रह जाएं। यह सुनने में थोड़ा अटपटा लगता है, क्योंकि आमतौर पर नेता मुख्यमंत्री बनने के लिए दांव-पेच चलते हैं, लेकिन गहलोत का दावा है कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाए रखने के लिए साजिश की गई।

आखिर यह खेल खेला किसने?

गहलोत कह रहे हैं कि उनके साथ खेल हुआ। अब सवाल यह है कि यह खेल खेला किसने? अगर 2022 के उस पूरे घटनाक्रम को याद करें तो तीन प्रमुख किरदार उभरकर सामने आते हैं।

पहला किरदार है दिल्ली से भेजे गए पर्यवेक्षक। गहलोत की पीड़ा है कि मल्लिकार्जुन खरगे और अजय माकन बहुत जल्दी जयपुर पहुंच गए, यानी उन्हें तैयारी का मौका ही नहीं मिला। अब यह तैयारी आखिर किस बात की थी? क्या यह आलाकमान के फैसले को पलटने की तैयारी थी?

दूसरा किरदार है सचिन पायलट गुट। गहलोत ने साफ कहा कि विधायकों की नाराजगी उन लोगों से थी जो मानेसर गए थे। यानी निशाना सीधे-सीधे पायलट पर है। पर क्या कोई कनिष्ठ नेता इतना ताकतवर हो सकता है कि वह अपने कद्दावर मुख्यमंत्री को जबरन ‘कुर्सी’ पर बैठाए रखे और दिल्ली जाने से रोक दे?

तीसरा किरदार खुद ‘जादूगर’ अशोक गहलोत की अपनी टीम है। क्या यह संभव है कि गहलोत के अपने ही वफादारों ने ऐसी पटकथा रची हो, जिसमें गहलोत को बेबस और आलाकमान को जल्दबाज दिखा दिया गया हो?

कुर्सी का मोह या दिल्ली का डर?

अशोक गहलोत कहते हैं कि वे तो अध्यक्ष बनना चाहते थे। लेकिन 2022 का पूरा देश गवाह है कि जब सोनिया गांधी ने उन्हें दिल्ली बुलाया, तो शर्त सिर्फ एक थी एक व्यक्ति, एक पद। गहलोत की मंशा थी कि दिल्ली का ताज भी उनके सिर सजे और जयपुर का रिमोट भी उन्हीं के हाथ में रहे। जब यह मुमकिन नहीं दिखा, तो जयपुर में वही इस्तीफे वाला नाटक हुआ, जिसने पूरी दुनिया में कांग्रेस की किरकिरी करवा दी। पर्यवेक्षक होटल में बैठे रह गए और गहलोत समर्थक विधायक धारीवाल के बंगले पर अपने इस्तीफे सौंप रहे थे।

आज जब सत्ता हाथ से फिसल चुकी है, तो उसी बगावत को साजिश का नाम देकर खुद को पीड़ित साबित करना एक शानदार राजनीतिक स्टंट तो हो सकता है, मगर सच्चाई को छिपाना आसान नहीं है।

‘बड़ी लकीर’ और पुरानी टीस

गहलोत ने एक बेहद दार्शनिक बात कही। उन्होंने कहा कि दूसरों की लकीर मिटाने के बजाय अपनी बड़ी लकीर खींचो। पांच साल तक राजस्थान ने यह देखा कि किसकी लकीर छोटी की जा रही थी। कभी नकारा-निकम्मा कहकर, कभी फाइलें रोककर, तो कभी नियुक्तियों में किनारे लगाकर।

आज जब सचिन पायलट राहुल गांधी के करीब नजर आ रहे हैं, जब पायलट को छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक बड़ी जिम्मेदारियां मिल रही हैं, तब गहलोत साहब को नैतिकता और लकीर याद आ रही है। क्या सच यह है कि गहलोत अब उस लकीर के छोर पर खड़े हैं, जहां से आगे का रास्ता तो दिल्ली की ओर जाता है, लेकिन वहां अब मल्लिकार्जुन खरगे मजबूती से जमे हुए हैं। और पीछे मुड़कर देखें, तो राजस्थान की लकीर अब पायलट के हाथों में दिखाई दे रही है।

यू-टर्न और माफी का खेल

गहलोत ने यह भी याद दिलाया कि उन्होंने सोनिया गांधी से माफी मांगी थी। राजनीति में माफी अक्सर तभी मांगी जाती है जब पासा उल्टा पड़ जाता है। उस वक्त माफी मांगकर कुर्सी बचा ली गई, लेकिन आज उसी माफी का जिक्र करके वे यह जताना चाहते हैं कि मैं तो बेहद आज्ञाकारी था, गड़बड़ी तो बाकी लोगों ने की।

पर जादूगर गहलोत साहब, जनता और पार्टी कार्यकर्ता यह बखूबी जानते हैं कि मुख्यमंत्री की मर्जी के बिना 90 विधायक आलाकमान के खिलाफ बगावत नहीं कर सकते। यह अदृश्य जादू तो केवल आप ही दिखा सकते थे।

टाइमिंग का कमाल: अब क्यों याद आई साजिश?

राजस्थान में अब भजनलाल सरकार है और कांग्रेस विपक्ष में बैठी है। गहलोत को यह डर सता रहा है कि कहीं वे मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा न बन जाएं। इसीलिए पुरानी आग को हवा देकर वे चर्चा में बने रहना चाहते हैं। राहुल गांधी द्वारा हाल ही में पायलट और प्रदेश अध्यक्ष की तारीफ करना गहलोत को चुभ गया है।

यह बयान दरअसल आलाकमान को यह याद दिलाने के लिए है कि देखिए, आपने जिन पर भरोसा किया, उन्होंने ही मेरे खिलाफ साजिश रची थी। गहलोत कह रहे हैं कि वे किसी पद की रेस में नहीं हैं, लेकिन साथ ही मुस्कुराते हुए यह भी जोड़ देते हैं कि अगर पार्टी जिम्मेदारी दे दे, तो बात अलग है। यही मुस्कुराहट असली खेल है। यह इशारा है कि जादूगर अभी रिटायर होने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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